Thursday, April 26, 2012

महामृत्युंजय मंत्र का पूर्ण विधान

महामृत्युंजय मंत्र के लिये कई प्रकार की धारणाये मिलती है और अधिकतर केवल मंत्र को ही बताया गया है तथा बिना विधान के उसके जाप के बाद भी फ़ल प्राप्ति नही होती है तो मंत्र को दोष देकर लोग अलग हो जाते है या काल कर्म ईश्वर को दोष देकर दूर हट जाते है। महामृत्युंजय संजीवनी बूटी की तरह से अपना काम करता है और अपनी अवधि नौ महिने तक काम भी करता है,लेकिन विधान से इसे किया जाय तो अन्यथा केवल वाणी की विग्यता के अलावा और कुछ भी हासिल नही होता है,चालाक पंडित अपनी दक्षिणा लेकर चलते बनते है फ़ल मिले या न मिले यह व्यक्ति के भाग्य पर निर्भर होता है।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिर जीविन:॥
सप्तैतान संस्म्रेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्ट मम।
जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जित:॥
अर्थात अश्वत्थामा बलि वेदव्यास विभीषण हनुमान कृपाचार्य परशुराम तथा मार्कण्डेय मुनि को जो प्राणी प्रात:काल मे स्मरण करता है वह शतायु होता है।
यह आठों लोग अमर है.
कथा इस प्रकार कही जाती है:-

मुकुन्ड मुनि के कोई संतान नही थी,संतान की प्राप्ति हेतु मुनि ने सप्त्नीक भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव उनकी तपश्या से अत्यन्त प्रसन्न हुये और वर मांगल्ने के लिये कहा। मुनि ने पुत प्राप्ति की कामना व्यक्ति की तो भगवान शिव बोले हे मुने ! तेजस्वी बुद्धिमान ग्यानी चरित्रवान पुत्र चाहते हो तो वह मात्र सोलह वर्ष तक जीवित रहेगा। अग्यानी और चरित्रहीन पुत्र पूर्ण आयु वाला होगा। आप कैसा पुत्र चाहते हो। मुनि ने अल्पायु वाला गुणवान पुत्र ही मांगा। शिव की कृपा से मुनि को गुण सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति हुयी। मुनि ने उसका नाम मार्कण्डेय रखा। 

समयानुकूल उनकी शिक्षा दीक्षा चलती रही। मृत्यु का समय निकट आता जान मुनि चिंतित रहने लगे एक दिन पुत्र ने जब उनकी उदासी का कारण जानना चाहा तो मुनि ने पुत्र को पूरी जानकारी दे दी। मार्कण्डेय को अपनी साधना पर विश्वास था। उन्होने प्रण किया कि मै भगवान मृत्युंजय को प्रसन्न करने के बाद पूर्ण आयु को प्राप्त करूंगा। इस प्रकार बालक मार्कण्डेय विधि विधान से आशुतोष की उपासना मे लग गये। वे लिंग पूजा करके मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करते थे। शिवजी उनकी साधना से प्रसन्न हुये।

सोलहवे साल मे अन्तिम दिन मृत्यु उनके सम्मुख आ गयी। मार्कण्डेय ने उनसे स्तोत्र को पूर्ण करने देने का आग्रह किया परन्तु मृत्यु ने उन्हे ऐसा करने की अनुमति नही दी। जब काल ने मुनि मार्कण्डेय के प्राण हरण करने चाहे तो भगवान शिव लिंग से प्रकत हो गये। यमदेव भगवान से भयभीत होकर चले गये। स्तोत्र की समाप्ति पर प्रसन्न होकर प्रलयंकर ने उन्हे अमरता का वरदान दिया।

स्तोत्र की विधि

रोजाना नित्य कर्म से मुक्त होकर पवित्र स्थान मे लाल ऊन का आसन बिछाकर पूर्व दिशा की तरफ़ मुंह करके अपने सामने चौकी पर शिव प्रतिमा या लिंग स्थापित कर संकल्प करे,संकल्प मे मानसिक धारणा करे धारणा मे यह भाव होना चाहिये कि कष्ट रोग अल्पमृत्यु का आना भयंकर पीडा आदि कि अपने लिये या किसी दूसरे के लिये उसके नाम गोत्र सहित मानसिक स्मरण करे,संकल्प के पश्चात हाथ मे जल फूल और चावल लेकर विनियोग करें। 

विनियोग

ऊँ अस्य श्री महामृत्युंजय मन्त्रस्य वामदेव कहोलवशिष्ठा ऋषय: पंक्तिगायत्र्युषिणगनुष्टप छन्दसि सदाशिवमहामृत्युंजय्रुद्रो देवतां ह्रां (धरती पर विचरण करने वाले कष्ट जिनका पता हो) ह्रीं (पाताली कारण यानी जिनके बारे मे पता नही हो) ह्रौं (उपरत्व भूत प्रेत पिशाच जो दिखाई नही देने वाले हों) शक्ति: श्रीं बीजं महामृत्युंजय प्रीतये ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

(यह कहकर हाथ मे लिये हुये जल और फ़ूल आदि को धरती पर गिरा दें और ऋषयादि न्यास करें)

ऋष्यादिन्यास

वामदेव कहोल वशिष्ठ ऋषिभ्यो नम: शिरसि । (सिर को छुयें)
पंक्तिगायत्र्युषिणगनुष्टुप छन्दांसि नम: मुखे (मुख को छुयें)
सदाशिवमहामृत्युंजयरुद्र देवतायै नम: ह्रदि। (ह्रदय को छुयें)
ह्रीं शक्तये नम: गुह्ये। (गुह्य भाग को छुयें)
श्रीं बीजाय नम: पादयो। (पैरों को छुयें)
विनियोगाये नम: सर्वांगे । (शरीर के सभी अंगो को स्पर्श करें)

करन्यास

ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: त्र्यम्बकम ऊँ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा - अंगुष्ठाभ्याम नम: (दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों से अंगूठों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: यजामहे ऊँ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय बद्ध तर्जनीभ्या नम: (अंगूठों से तर्जनियों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम ऊँ भगवते रुद्राय चन्द्र शिरसे जटिने स्वाहा मध्यमाभ्यं नम: (अंगूठों से दोनो मध्यमा उंगलियों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: उर्वारुकमिवबन्धनात ऊँ भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय ह्रीं ह्रीं अनामिकाभ्याम नम: (दोनो अंगूठों से अनामिका उंगलियों को छुयें).



Wednesday, April 18, 2012

उड्डीस तंत्र

ज्ञानांजन शलाका द्वारा अज्ञानता को दूर कर ज्ञान चक्षुओं को खोल देने वले श्री सदगुरुदेव को नमस्कार है। कैलाश पर्वत की चोटी पर बैठे हुये भगवान शिव से रावण ने निवेदन किया हे प्रभु आप मुझे ऐसी कोई तंत्र विद्या बतायें जिससे क्षणमात्र मे सिद्धि की प्राप्ति हो जाये। भगवान शिव बोले हे वस्त तुमने यह श्रेष्ठ प्रश्न पूछा है अत: लोक हितार्थ मैं उड्डीस तंत्र का वर्णन कर रहा हूँ।

जिसे उड्डीस तंत्र का पता नही है वह दूसरो पर गुस्सा करने के बाद कर भी क्या सकता है वह केवल अपने लहू और आत्मा मे चीत्कार कर सकता है और अपने ही शरीर को जला सकता है अपनी दिन चर्या को बरबाद कर सकता है। जैसे रात मे चन्द्रमा नही हो तो रात बेकार लगती है दिन मे सूर्य नही उदय हो तो दिन बेकार हो जाता है जिस राज्य मे राजा नही होता वह राज्य बेकार होती है वैसे बिना गुरु के कोई भी मंत्र की सिद्धि नही होती है।

पुस्तकों को पढकर किसी भी विद्या का ज्ञान नही होता है बिना गुरु के किसी भी तंत्र का अनुष्ठान हो ही नही सकता है,कलयुग मे जब गुरु की मान्यता ही समाप्त हो जाती है तो तंत्र के नाम पर केवल मदारी जैसे करिश्मे दिखाने से कोई तांत्रिक नही बनता है,गुरु मिलते भी है तो वे केवल अपना भंडार भरने वाले होते है,जो झूठ बोलना जानता हो और मजाक करने के बाद अपनी प्रस्तुति देना जानता हो कलयुग मे वही ज्ञानी और भक्ति से युक्त जान पडता है,इस समय मे भजन और कीर्तन भी चकाचौंध मे किये जाते है जो जितना मोहक और कामुक गाना बजाना नृत्य करना जानता है वही बडा भजन गाने वाला और भक्त कहलाता है।

उड्डीस तंत्र मे षडकर्म का उल्लेख जरूरी है इनके विधिवत अनुष्ठान से मनुष्य कुछ सिद्धिया जरूर प्राप्त कर सकता है जिससे वह अपनी जीविका और घोर जिन्दगी को खुशी जिन्दगी मे बदल सकता है। षटकर्म विधान मे शान्ति कर्म वशीकरण स्तंभन बैरभाव उच्चाटन और मारण आदि षटकर्म कहे गये है। जब मनुष्य अधिक क्रूर व्यक्तियों और समुदाय मे घिर जाता है चारो तरफ़ कलह और मारधाड ही देखने को मिलती है कसाई का काम करने वाले बढ जाते है तो शान्ति कर्म की प्रधानता बताई जाती है इस शान्ति कर्म वाले विधान करने से क्रूर शक्तियां पलायन कर जाती है और खुशहाली आजाती है लोग एक दूसरे के प्रति दया करना शुरु कर देते है। यही शान्ति कर्म जब शरीर मे रोग पैदा होते है ग्रहो का दोष पैदा हो जाता है तो किये जाते है।

जब अपना स्थान बनाने केलिये और अपने को सभी के प्रति सम्मान के भाव मे प्रस्तुत करने के लिये सभी को अपने प्रभाव मे लाने के लिये जो कार्य किये जाते है वह वशीकरण की श्रेणी मे आते है।पति पत्नी मे जब बैर भाव पैदा हो जाये माता पुत्र अलग अलग हो जाये पिता का सहयोग नही बन रहा हो भाई बहिन ही खुद के बैरी हो जाये तो वशीकरण नामक प्रयोग लाभदायी होता है।

जब समस्याये लगातार आगे बढती आ रही हो बैर करने वाले लोग चारो तरफ़ से घेरा डाल रहे हो पुलिस मुकद्दमा अस्प्ताल आदि के कारण लगातार घेरने लगे हो तो स्तम्भन नाम का तंत्र प्रयोग किया जाता है यही प्रयोग वे लोग भी अपनाते है जो अपने साथ के लोगो से आगे निकलने की होड मे अपने प्रभाव को हमेशा रखने के लिये उन्हे पीछे करना चाहते है लेकिन यह पापकर्म के अन्दर आने से उड्डीस तंत्र मे इसका प्रयोग खुद के लिये हानिकारक बन जाता है,जहां कोई बैर से आगे बढने की योजना को बनाता है और छल फ़रेब से आगे निकलने की क्रिया को करता है अनुचित काम करने के बाद वह आगे जाना चाहता है उसके लिये स्तम्भन का कार्य करना हितकर होता है।

जब दो लोग या कई लोग मिलकर किसी के अहित की बात करते है राज्य को गिराने की कोशिश मे होते है किसी दयावान को परास्त करने की योजना को बनाते है किसी एक समुदाय द्वारा हिंसक योजना से किसी अन्य समुदाय को विनाश की योजना आदि बनाने मे जिनका मन लगता है और वे कई लोगो के साथ मिलकर योजना को बनाकर अनुचित काम करना चाहते है या कई ग्रुप मिलकर एक ग्रुप को समाप्त करना चाहते है उनके लिये विद्वेषण तंत्र का प्रयोग किया जाता है जिससे वह इकट्ठे भी नही रह पाते है और वह किसी अन्य के प्रति कभी भी कोई अनुचित काम भी नही कर पाते है।

जब कोई एक स्थान पर रहकर अनुचित कामो मे लगा हुआ है उसके रहते हुये कई लोगो को परेशानी हो रही है वह लोकहित के कामो को तिलांजलि देकर अनैतिक कामो को कर रहा है जिससे समाज परिवार और घर के अन्दर कलह का वातावरण आदि बनता जा रहा है एकता के अन्दर वह व्यक्ति अपनी नीति और चालाकी से दिक्कत को देने वाला है उसके लिये उच्चाटन नामक तंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस प्रयोग के बाद वह दिक्कत देने वाला व्यक्ति दूर चला जाता है और समाज परिवार समुदाय सुरक्षित रह जाता है।

जब एक व्यक्ति लोगो के लिये हिंसा का काम करने लग जाये वह मनुष्य और जीवो को मारने काटने मे ही रुचि को रखना शुरु कर दे उसे दया का नाम ही पता नही हो तथा वह धर्म अर्थ काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थो का विनास करने पर तुल जाये तो उसके लिये जो प्रयोग किया जाता है वह मारण प्रयोग के नाम से जाना जाता है।

षटकर्मो के देवी देवता भी होते है जिनकी उपासना करने से इन कर्मो की सिद्धि प्राप्त होती है। शांति के काम करने के लिये वशीकरण के लिये अपनी वाणी को प्रयोग मे लाने के लिये स्तंभन के लिये लक्ष्मी की उपासना की जाती है। ज्येष्ठा नामक शक्ति की उपासना उच्चाटन के लिये की जाती है,मारण प्रयोग के लिये काली की उपासना की जाती है।

षटकर्मो को करने के लिये दिशा का निर्धारण भी किया जाता है शांति कर्म को करने के लिये ईशान दिशा मे बैठ कर और ईशान मे ही अपने मुंह को करने के बाद आराधना करना चाहिये वशीकरण के लिये उत्तर दिशा की तरफ़ बैठ कर और अपना मुंह भी उत्तर दिशा की तरफ़ करके बैठ कर उपासना करना चाहिये। स्तम्भन के लिये पूर्व दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये विद्वेषण के लिये दक्षिण-पश्चिम दिशा मे बैठकर उपासना करना चाहिये और इसी दिशा मे अपने मुंह को करना चाहिये। उच्चाटन के लिये उत्तर-पश्चिम दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये मारण कर्म के लिये उपासना करने के लिये अग्नि कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा मे बैठ कर और मुंह करके उपासना करना चाहिये।

इन कर्मो को करने के लिये समय का भी निर्धारण किया जाता है। वैसे तो साल मे ऋतुओं का आना जाना होता है लेकिन सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच मे भी छ: ऋतुयें आती जाती है। सूर्योदय से चार घंटे के लिये बसंत ऋतु का आना होता है,फ़िर चार घंटे के लिये ग्रीष्म ऋतु का आना होता है उसके बाद वर्षा ऋतु का आना होता है,फ़िर शरद ऋतु का आना होता है फ़िर हेमंत ऋतु का आना होता है और दूसरे सूर्योदय के समय तक शिशिर ऋतु का आना होता है।

सूर्योदय से चार घंटे की अवधि बसंत ऋतु की होती है इस समय में वशीकरण वाली साधना की जाती है,सूर्योदय के चार घंटे बाद ग्रीष्म ऋतु में विद्वेषण की साधना की जाती है। सूर्योदय के आठ घंटे बाद वर्षा ऋतु के समय में उच्चाटन की साधना की जाती है,सूर्योदय के बारह घंटे बाद मारण क्रिया की साधना की जाती है,सूर्योदय के सोलह घंटे बाद शांति कर्म की साधना की जाती है,सूर्योदय के बीस घंटे के बाद स्तम्भन क्रिया की साधना की जाती है यह साधना किसी भी देश मे किसी भी ऋतु मे हमेशा ही मान्य होती है।

हिन्दू तिथि के अनुसार दूज तीज पंचमी और सप्तमी बुधवार गुरुवार और सोमवार शांति कर्म के लिये प्रयोग मे है गुरुवार सोमवार को आने वाली छठ चौथ त्रियोदशी नवमी अष्टमी दसमी पुष्टि कर्मो के लिये दसवी एकादशी अमावस्या नवमी पडवा व शुक्रवार रविवार को आने वाली पूर्णिमा विद्वेषण हेतु कही गयी है। छठ चौथ आठें विशेष रूप से प्रदोष को यदि शनिवार आता हो तो उच्चाटन करना उचित नही होता है इसी प्र्काअर से अन्धेरी रात की चौदस अमावस्या तिथि और शनिवार या मंगलवार के दिन मारण कर्म करना मना किया गया है,साथ ही स्तंभन के काम हेतु बुधवार या सोमवार तथा पंचमी दसवी और पूर्णिमा तिथि खराब बताई जाती है,जब अनुकूल ग्रह हों तभी शांति पुष्ट और शुभ काम करना चाहिये। जब प्रतिकूल ग्रह हो तब मारण उच्चाटन आदि कार्य नही करना चाहिये इसी प्रकार से रिक्ता तिथियों चौथ नौवीं चौदस मे विद्वेषण व उच्चाटन आदि काम और मृत्यु योग होने पर मारण करना नही बताया गया है।

ज्येष्ठा उत्तराषाढा अनुराधा रोहिणी उतराभाद्रपद मूल शतभिषा पूर्वाभाद्रपद आश्लेषा नक्षत्रों मे स्तंभव मोहन वशीकरण करने मे सफ़लता मिलती हिअ इसी तरह से स्वाति हस्त मृगशिरा चित्रा उत्तराफ़ाल्गुनी पुष्य व पुनर्वसु अश्विनी भरणी आर्द्रा धनिष्ठा श्रवण मघा विशाखा कृत्तिका पूर्वाफ़ाल्गुनी रेवती नक्षत्रों में विद्वेषण व उच्चाटन कर्म करने से सफ़लता मिलती है। दिन के पूर्व भाग मे वशीकरण मध्यभाग में विद्वेषण व उच्चाटन अंतिम भाग में शांति और पुष्ट कर्म प्रदोषकाल शाम के समय मे मारण आदि कर्म करना फ़लदायी नही होता है। सिंह या वृश्चिक लगन मे स्तंभन कर्म कर्क या तुला लगन मे उच्चाटन कर्म तथा मेष कन्या धनु मीन लगन मे वशीकरण शंति पुष्टि मारण उच्चाटन शत्रुदमन आदि करना खराब बताया गया है।

तत्व के उदय होने पर कौन सा कर्म करना उचित रहता है वह इस प्रकार है शांति कर्म जल तत्व के उदय होने पर वशीकरण अग्नि तत्व के उदय होने पर स्तंभन भूमि तत्व के उदय होने पर विद्वेषण आकाश तत्व के उदय होने पर उच्चाटन वायु तत्व के उदय होने पर मारण कर्म भूमि तत्व के उदय होने पर करना उचित नही होता है इसी तरह तत्व उदय के बारे मे जानकार तत्संबन्धी तत्वानुसार मंडल बनाकर कर्म करने से सिद्धि मिलती है। वशीकरण शोभन कार्यो के लिये लाल रंग के देव देवी शांति विष प्रभाव को दूर करने के लिये पुष्टि कर्म के लिये सफ़ेद रंग के देव का मनाया जाना उचित होता है,स्तम्भन कार्य के लिये पीले रंग के देव देवी उच्चाटन कर्म के लिये धुयें के रंग के देवी देवता उन्माद कर्म के लिये भी लाल रंग के देवी देवता मारण कर्म के लिये काले रंग के देवी देवता का ध्यान करना उचित होता है।

मारण कर्म मे खडे हुये रूप में उच्चाटन काल मे सोते हुये अन्य कर्मो मे सामने बैठे हुये देवता का ध्यान करना चाहिये। सात्विक काम मे सफ़ेद देवता का सामने बैठे हुये रूप का ध्यान करना ठीक होता है इसी प्रकार किसी प्रकार के राजसी काम पीले व लाल रंग के व काले रंग के देवता को ध्यान मे रखना चाहिये तामसिक काल मे वाहन पर सवार काले देवता का ध्यान करना चाहिये मोक्षकामी को सात्विक राज्य की आशा वाले को राजसी रूप का ध्यान रखना चाहिये इसी प्रकार से शत्रु विनास पीडा हरण व समस्त विघ्न विनाश हेतु देवता का तामसिक रूप का ध्यान करना चाहिये।

रुद्र मंगल गरुड गंधर्व यक्ष सर्प किन्नर पिशाच भूत असुर इंद्र विद्याधर देवता आदि सभी मंत्रो के अधिष्ठाता देवता है। एक वर्ण का मंत्र कर्तरी यानी इच्छा को खत्म करने वाला और कमजोर दो वर्ण का मंत्र सूची यानी बिना मांगे ही दुख को देने वाला तीन अक्षर का मंत्र डंडे का काम करने वाला चार अक्षर का मंत्र मूसल का काम करने वाला पांच अक्षरो का मंत्र क्रूर शनि के रूप में छ: अक्षर का मंत्र लगातार विचार मे मग्न रहने वाला सात अक्षर का मंत्र कांच की तरह तोड देने वाला आठ अक्षर का मंत्र कांटे की तरह से चुभने वाला नौ अक्षर का मंत्र पत्थर की तरह से कठोर दस का शक्ति ग्यारह का फ़रसे जैसा बारह का चक्र तेरह का दो भालो के रूप मे चौदह का नाराच पन्द्रह का भुसुंडी अस्त्र सोलह का पद्म यानी कमल के रूप का माना जाता है। वाणी को समाप्त करने मे कर्तरी भेद कर्म मे सूची भजन मे मुदगर अरुचि पैदा करने में मूसल बन्धन में श्रंखल विद्वेषण मे डंडा सभी कामो मे चक्र उन्माद मे कुलिस सैन्य भेदन में नाराच मारण कर्म में भुसुण्डी शांति कर्म मे पदम मंत्र का उच्चारण करने मे अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

पचास अक्षरो का मंत्र जो देवी माँ के रूप मे प्रयोग किया गया हो वह सभी प्रकार के भय हरने वाला कहा जाता है जो व्यक्ति जिस किसी कामना से किसी प्रकार का मंत्र जाप करता है उसकी वह मनोकामना पूरी होती है मंत्र के प्रारम्भ मे आने वाला नाम पल्लव कहलाता है मारण विनाश ग्रह भूत आदि के शमन के लिये उच्चाटन विद्वेषण कामो के लिये पल्लव युक्त मंत्र का ही जाप किया जाता है। मंत्र के आखिर मे आने वाला नाम योजन मंत्र कहलाता है इस मंत्र का जाप वशीकरण प्रायश्चित मोहन दीपन आदि कामो मे प्रयोग किया जाता है इनके अतिरिक्त स्तंभन व विद्वेषण कर्मो मे भी इस मंत्र का जाप किया जाता है नाम के प्रारम्भ मध्य और अंत मे मंत्र आने से इसे रोध मंग कहा जाता है अभिमुखीकरण सभी प्रकार की व्याधियों बुखार ग्रह प्रकोप विष आदि के प्रभाव को दूर करने के लिये रोध मंत्र का ही जाप किया जाना चाहिये। नाम के आदि मध्य अंत मे जो मंत्र आता है वह ग्रंथन मंत्र कहलाता है,इस मंत्र का जाप शांति कर्म मे किया जाता है नाम के प्रारम्भ मे अनुलोम व अंत मे विलोम रूप से जो मंत्र आता है वह संपुट मंत्र कहलाता है कीलन कर्म मे संपुट मंत्र का जाप किया जाता है इसके अलावा स्तंभन मौत को दूर करने रक्षा करने जैसे कर्म भी इस मंत्र का जाप करने से सिद्धि मिलती है।

प्रारम्भ मे पूर्ण मंत्र बोलकर साध्य का नामोच्चारण कर फ़िर प्रतिकूल भाव से पूर्ण मंत्र का उच्चारण करने को भी तंत्रशास्त्र मे संपुट मंत्र ही कहा गया है इसी प्रकार मंत्र व साध्य नाम के दो वर्णों का क्रमानुगत उच्चारण ही सविदर्भ मंत्र कहलाता है इस मंत्र का उपयोग वशीकरण आकर्षण व पुष्टि कर्म आदि मे करने से सिद्धि प्राप्त होती है। बन्धन उच्चाटन व विद्वेषण मे हुं अरिष्ट ग्रह शांति हेतु हुं फ़ट पुष्टि शांति कर्म हेतु वौषट हवन करते समय स्वाहा पूजन काल मे नम: का उच्चारण किया जाना चाहिये,शांति व पुष्टि कर्म मे स्वाहा वशीकरण मे स्वधा विद्वेषण मे वषट आकर्षण में हुं उच्चाटन में वैषट मारण में फ़ट बीजमंत्र का उच्चारण किया जाता है।

आगे जारी है ...........................!