Saturday, February 2, 2013

दाहिने और बायें गणेश

जीवन के दो रूप हर किसी के सामने होते है,पहला प्राप्त करना और दूसरा देना,देना तभी होता है जब प्राप्त होता है बिना मिले दिया भी क्या जा सकता है ? जीवन के प्रति दो धारणाये आदि काल से चली आ रही है जीवन का पहला हिस्सा लेने का और दूसरा हिस्सा देने का। पहले हिस्से मे कुंडली का बायां हिस्सा आता है,और देने के लिये दाहिना हिस्सा सामने आता है। इसी प्रकार से देवी देवता की द्रिष्टि की महत्ता को भी देखा गया है। दाहिनी नजर देने वाली होती है और बायीं नजर प्राप्त करने वाली होती है। बायां हिस्सा भौतिकता की नजर से और दाहिना हिस्सा आध्यात्मिकता की नजर से देखा जाता है। विघन हर्ता गणेश को हर कार्य मे पहले स्मरण किया जाता है उनकी पूजा भूतडामर तंत्र के अनुसार प्रथम मानी जाती है और उनके अन्दर एको रूप अनेका के प्रति भी मान्यता की धारणा आदिकाल से चली आ रही है। बायें सूंड वाले गणेश जी उन लोगो के लिये फ़लीभूत होती है जो कभी कभी गणेश जी की पूजा पाठ करना जानते है और केवल मानसिक धारणा को रखकर ही चलने वाले होते है लेकिन जो लोग जगत कल्याण की भावना से काम करते है लोगो के लिये सुख और समृद्धि का रूप प्रदान करते है साधारण जीवन नही जीकर बडे और विस्तृत जनसमुदाय के प्रति अपनी भावना को रखते है उनके लिये दाहिनी सूंड वाले गणेश जी की मान्यता काफ़ी हद तक फ़लीभूत होती है।
एक दोहा प्राचीन काल से भारतीय मान्यता मे गाया जाता है :-
सदा भवानी दाहिने सन्मुख रहे गणेश। पांच देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेश॥
इस दोहे का अर्थ है कि शक्ति रूपा माता दुर्गा हमेशा दाहिने रहे,सामने गणेश जी रहे और इन दोनो के अलावा तीनो देव ब्रह्मा (शरीर के बीच में) विष्णु (शरीर के बायें) और महेश यानी शिवजी (शरीर के दाहिने) विराजकर रक्षा करते रहे। इस दोहे के अनुसार शक्ति का रूप हमेशा दाहिने ही होता है और दाहिने हाथ से दाहिने तरफ़ के कार्यों से और दाहिनी कार्य प्रणाली से लोग अपने अपने कार्य को शीघ्र निपटाने की क्षमता रखते है,धरती की घूमने की क्रिया भी बायें से दाहिने होती है आदि बातो से दाहिनी तरफ़ का प्रकार हमेशा सही माना जाता है और सीधे उल्टे का रूप भी दाहिने और बायें से लिया जाता है। जिनका दाहिना सक्षम होता है वे दूसरो को सहायता दिया करते है और जिनका बांयां सक्षम होता है वे लोगो की सहायता लिया करते है।
गणेश जी की मान्यता के लिये मेष राशि वालो के लिये लाल रंग के दाहिने वृष राशि वालो के लिये सफ़ेद गणेश बायें मिथुन राशि के लिये हरे गणेश दाहिने कर्क राशि के लिये स्फ़टिक के गणेश बायें सिंह राशि के लिये गुलाबी गणेश दाहिने कन्या राशि के लिये मटमैले रंग के गणेश बायें तुला राशि के लिये सफ़ेद गणेश दाहिने वृश्चिक राशि के लिये कत्थई गणेश बायें धनु राशि के लिये पीले गणेश दाहिने मकर राशि के लिये काले गणेश बायें कुम्भ राशि के लिये काले सफ़ेद धारी वाले गणेश दाहिने और मीन राशि के लिये सुरमई (स्लेटी) रंग के गणेश बायें की मान्यता है जिनके पास अलावा रंगो के गणेश जी है और वे अपने अपने अनुसार प्राप्त नही कर सकते है तो गणेश जी की प्रतिमा को अपनी अपनी राशि के अनुसार पोशाक पहिनाकर बनाया जा सकता है।
दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को घर मे रखा जा सकता है लेकिन पूजा स्थान मे ही रखा जाता है लेकिन बायें सूंड वाले गणेश जी को दरवाजे तक ही सीमित रखा जाता है घर के अन्दर उनकी मान्यता नही होती है बायीं तरफ़ वाले गणेश जी को दरवेश यानी दरवाजे की रक्षा करने वाले देवता के रूप मे मानी जाती है। अक्सर वास्तु विद अपनी बुद्धि से कहने लगते है कि गणेश जी के पीछे गरीबी होती है और आगे अमीरी होती है लेकिन यह कथन वास्तव मे आस्तित्वहीन है,कारण गणेश जी सामने से विघ्न विनाशक है तो पीछे से रक्षा करने वाले है,इसलिये गणेश जी के पीछे चलने वाले लोग काफ़ी सम्पन्न और सुखी रहते है गणेश जी के आगे रहने वाले लोग हमेशा किसी न किसी बाधा से इसलिये पीडित होते है क्योंकि मानवीय शरीर के अन्दर कोई न कोई अवगुण होगा ही और उस अवगुण की प्रताणित होने वाली पीडा मे लोग आहत होते रहते है।
बायीं तरफ़ सूंड वाले गणेश जी को किसी भी समय पूजा जा सकता है और कहीं भी पूजा की जा सकती है लेकिन दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को केवल पूजा स्थान मे ही मान्यता है और उनकी पूजा गणेश जी के लिये मान्य अवसरो पर ही की जाती है। गणेश जी को भूल कर भी गीली मिठाई या शर्बत आदि नही चढाया जाता है इनके लिये बुध प्रधान होने के कारण केवल गोल और सूखी मिठाई ही चढाई जाती है। गणेशजी को लोग दूर्वा चढाने का उपक्रम भी करते है लेकिन दूर्वा को केवल गणेश जी को स्थापित करने के समय या घर मे लाने के समय प्रयोग मे लाया जाता है,इसका भी एक भेद माना जाता है कि दूर्वा गणेश जी को प्रिय नही है यह उनकी सवारी मूषकराज को पसंद है और गणेश जी को स्थान तक लाने मे उनका भी योगदान होता है। जिसके पूजा स्थान मे चूहे और चुहियाओं के द्वारा मींगणी छोड दी जाती है उन्हे समझ लेना चाहिये कि उनके पूजा स्थान की जगह को गणेश जी छोड चुके है,उन्हे दुवारा से गणेश की तिथि में स्थापना करने के बाद उनकी पूजा अर्चना शुरु करनी चाहिये। गणेश जी का आसन भी गोल होना चाहिये और उनके लिये पूजा मे प्रयोग करने वाले बर्तन आदि भी गोल होने चाहिये,गणेश जी को केवल उनकी पूजा की तिथियों मे ही स्नान करवना चाहिये रोजाना उन्हे स्नान नही करवाया जाता है। वस्त्र बदलने के समय भी उनके जनेऊ को कभी नही उतारना चाहिये,दशहरा के दिन उनके डंड को बदल देना चाहिये और डंड का रंग और बनावट भी बदलते रहना चाहिये। पूजा मे इन्हे रखने के लिये दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को पहले रखना चाहिये और उनका चेहरा दक्षिण दिशा को देखते हुये होना चाहिये।
(श्री गणेशाय नम:)
किसी भी जानकारी और शंका के समाधान के लिये कमेन्ट कर सकते है,आपकी कोई भी राय मेरे लिये अमूल्य होगी.

Thursday, November 22, 2012

मानसिक वासनायें और उनका विनाश

मानव शरीर मे इन्द्रिय सन्तुष्टि के लिये वासनाये बनती है। स्वाद की वासना जीभ से पनपती है,नाक से खुश्बू की वासना पैदा होती है मधुर और रसमय संगीत को सुनने की वासना कानो से पैदा होती है,खूबसूरत और विभिन्न प्रकार के उत्तेजक कारण देखने का मन करता है तो वासना आंखो से पैदा होनी मानी जाती है। कामोत्तेजक वासनायें सभी इन्द्रियों के चाहने पर ही पैदा होती है। पुरुष के लिये स्त्री के प्रति सम्बन्ध बनाने की और स्त्री के प्रति पुरुष के प्रति सम्बन्ध बनाने की वासना भी पैदा होती है। लेकिन कामोत्तेजक वासना के लिये सबसे पहला कारण होता है आंखो से द्रश्यों को देखना लेकिन आंखो की द्रश्यता तभी काम करती है जब भोजन मे तामसिक यानी शरीर मे बल प्रदान करने वाले तत्वो का अधिक लिया जाना हो,भोजन मे तत्वो का वर्गीकरण भी नाक से खुशबू लेकर कानो से उत्तेजक संगीत का सुनना तथा त्वचा से स्पर्श सुख का अनुभव करना आदि कारण एक साथ पनपते है तो ही माना जाता है। वासना के पैदा करने के लिये मानसिक सोच का सबसे बडा कारण भी माना जाता है। अगर वासना को पूरी तरह से सन्तुष्ट कर दिया जाये तो वासना देर तक पैदा नही होती है। उसी वासना को अगर देर तक दबाये रखा जाये तो वह वासना किसी भी हद तक पूरी करने का कारण बना रहता है। बल से बुद्धि से अर्थ से पराक्रम से वासना की पूर्ति का कारण देखा जाता है। लेकिन बल के काम आने का कारण तभी सफ़ल होता है जब बुद्धि भी काम कर रही हो और बुद्धि भी तभी सफ़ल हो पाती है जब अर्थ पास मे हो और अर्थ भी तभी काम कर सकता है जब पराक्रम यानी हिम्मत साथ दे रही हो। इन्ही कारणो की प्राप्ति के लिये लोग पहले शरीर को बनाते है फ़िर शिक्षा को पूरा करते है शरीर से बल और शिक्षा से बुद्धि की प्राप्ति होती है उसी बुद्धि के बल से अर्थ की प्राप्ति की जाती है और जब अर्थ प्राप्त हो जाता है तो अपनी हिम्मत को पैदा किया जाता है,हिम्मत के पैदा होने पर वासना की पूर्ति की जाती है।

सभी प्रकार की वासनाये मन पर निर्भर है,मन को मारकर किसी भी वासना को दबा भले दिया जाये लेकिन जब भी समय या कारण सामने होगा वासना अपने आप ही उदय हो जायेगी और वासना की पूर्ति के लिये मन अपना काम करना शुरु कर देगा। वासना के उदय होने का कोई समय नही होता है कोई उम्र नही होती है। चाकलेट खाने की चाहत बच्चे मे भी पैदा हो सकती है तो अस्सी साल के बुजुर्ग मे भी पैदा हो सकती है। यह स्वाद पर निर्भर है। वासना को एक रूप मे और भी पनपते देखा जा सकता है कि किसी भी वस्तु के नयापन मे भी मानसिक रूप वासना की पूर्ति के लिये देखा जाता है। कल अगर अरहर की दाल खाई गयी है तो दूसरे दिन अरहर की दाल की बजाय मूंग की दाल खाने का मन करेगा,अगर दूसरे दिन भी अरहर की दाल खिलाई जाये तो मानसिक इच्छा पूर्ण नही हो पायेगी।

वासना के उदय होने के लिये जो कारक सामने आते है वह इस प्रकार से है :-
  • मानसिक चाहत से
  • देखने से
  • सुनने से
  • इच्छा पूर्ति मे बाधा से
  • अधिक समय तक इच्छा को दबाये रहने से
इन पांच कारणो को शरीर के पंच भूतो से भी जोड कर देखा जाता है। शरीर की अग्नि भी उत्तेजक होने पर वासनाओ की उत्त्पत्ति का कारण माना जाता है,शरीर मे जल की अधिकता से भी वासना की उत्पत्ति का कारण बनता है शरीर मे भूमि तत्व की अधिकता से भी वासना की उत्पत्ति होती है,शरीर मे वायु की मात्रा बढने पर भी वासना की उत्पत्ति होती है और शरीर मे आकाश तत्व की अधिकता से भी निरंतर सोच से बाकी की वासनाओं मे वृद्धि का कारण देखा जाता है।
वासना की शांति के लिये निम्नलिखित उपाय किये जायें तो वासनाओ की अधिकता मे कमी आती है:-
  • ध्यान समाधि लगाने से मानसिक सोच की कल्पना का अन्त होता है.
  • मानसिक इच्छा से उत्पन्न वासना का जीभर कर उपभोग कर लेने से और मन की चाहत
    नही भी होने पर उस वासना की पूर्ति की जाती रहे.
  • उपवास से भोजन की वासना की चाहत पहले एक साल तक बढती है फ़िर भोजन की चाहत घटती जाती है.
  • स्वांस की गति को न्यंत्रित करने से सुगन्ध दुर्गन्ध की वासना समाप्त होती है.
  • एकान्त मे रहकर अपने अन्दर की आवाज सुनने अच्छा बुरा कठोर और मधुर आवाज की वासना समाप्त होती है.
  • तामसी भोजन से दूर रहना,लगातार कामोत्तेजक माहौल से दूर रहना सोते समय ईश्वर का ध्यान करना अपने जीवन साथी के अलावा अन्य को प्रकृति से जुडा देखना भोजन मे ठंडी तासीर वाले भोजन लेने से अधिक भोजन के त्याग से कामोत्तेजना मे शांति मिलती है.

Monday, November 12, 2012

लक्ष्मी मंत्र विभिन्न राशियों के लिये

संसार मे जन्म लेने वाले बुद्धिधारी जीवो मे मनुष्य का रूप सर्वोपरि है और बुद्धि से काम लेने के कारण मनुष्य को कोई भी शारीरिक शस्त्र जानवरो की तरह से पंजा नाखून सींग चीरने फ़ाडने वाले दांत आदि को प्रकृति ने प्रदान नही किया है। बुद्धि को ही मंत्र के रूप मे जगाया जाता है और जैसे ही बुद्धि काम करने लगती है मनुष्य अपने बल से यंत्रो का निर्माण करना शुरु कर देता है और बुद्धि तथा साधन प्राप्त होते ही मनुष्य जीवन मे अपने सुख साधनो के प्रयोग के लिये अपनी रक्षा के लिये भविष्य की समृद्धि के लिये रास्ते बनाने लगता है । बुद्धि को जागृत करने के लिये एक समय विशेष का चुनाव किया जाता है साधन बनाने के लिये भी एक समय विशेष का मूल्य होता है और साधन बनने के बाद उनसे अपने जीवन के कारको की प्राप्ति के लिये भी समय विशेष का कारण माना गया है। एक कहावत कही जाती है कि अस्पताल मे रोग के अनुसार जाना चाहिये,जैसे रोग तो ह्रदय रोग के रूप मे है और टीबी के अस्पताल मे जाया जाये तो रोग की पहिचान भी नही हो पायेगी जो दवा देनी है वह दवा नही मिलकर दूसरी दवाओ के लेने से रोग खत्म भी नही हो पायेगा और दूसरा रोग और पैदा होने की बात बन सकती है। उसी प्रकार से कहावत का दूसरा भाग बताया गया है कि मन्दिर मे भोग,यानी मन्दिर दुर्गा जी का है और वहां पर लड्डू का भोग लगाया जाये तो वह भोग लगेगा ही नही कारण दुर्गा के लिये तामसी भोग की जरूरत होती है और लड्डू तो केवल गणेश जी के लिये ही चढाने का प्रयोग है,उसी प्रकार से अगर हनुमान जी के मन्दिर मे तामसी भोग को चढाया जायेगा तो बजाय लाभ के नुकसान भी हो सकता है,कहावत का तीसरा भाग ज्योतिष मे योग के रूप मे समझना चाहिये,जब तक योग नही हो कोई काम करने से फ़ायदा नही हो पाता है,योग मे तीनो कारक बुद्धि साधन और साधनो से प्राप्त होने वाले लाभ मिलना लाजिमी होता है।
दीपावली को लक्ष्मी की आराधना का त्यौहार बताया जाता है। इस त्यौहार को वणिज कुल के लिये माना जाता है,चारो वर्णो मे तृतीय वर्ण वैश्य  वर्ण के लिये दीपावली का त्यौहार बताया गया है,जैसे क्षत्रिय के लिये दशहरा ब्राहमण के लिये रक्षाबन्धन वैश्य के लिये दीपावली और शूद्र वर्ण के लिये होली का त्यौहार बताया जाता है। अर्थ यानी धन सम्पत्ति का कारण आज के युग मे सभी के लिये जरूरी हो गया है और बिना अर्थ की प्राप्ति के शायद ही किसी का जीवन सही चल पाये,अगर बिना अर्थ के कोई भी जिन्दा रहना चाहता है तो वह या तो किसी गुफ़ा कन्दरा मे अपना जीवन निकाल रहा हो या वह सन्यासी बनकर मांग कर भोजन आदि का बन्दोबस्त अपने लिये कर रहा हो आदि कारण माने जा सकते है।

विभिन्न राशियों के लिये लक्ष्मी मंत्र का अलग अलग जाप बताया जाता है,कूर्म पुराण के अनुसार लक्ष्मी का रूप तीन प्रकार का माना जाता है सत के रूप मे अचल लक्ष्मी रज के रूप में चलित लक्ष्मी और तम के रूप मे झटति लक्ष्मी। इन तीनो प्रकार के लिये हर व्यक्ति के धन भाव के तीनो भावो को एक साथ जोडा गया है,और तीनो भावो के अनुसार सत से जोडी गयी लक्ष्मी दूसरे भाव से रज से जोडी गयी लक्ष्मी छठे भाव से और तम से जोडी गयी लक्ष्मी को द्सवे भाव से जोड कर देखा जाता है। प्रत्येक युग मे लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये चारो पुरुषार्थो का प्रयोग किया जाता रहा है। धर्म नाम का पुरुषार्थ मेष सिंह और धनु राशियों के लिये अर्थ नाम का पुरुषार्थ वृष कन्या और मकर राशियों के लिये काम नाम का पुरुषार्थ मिथुन तुला और कुम्भ राशियों के लिये तथा मोक्ष नामका पुरुषार्थ कर्क वृश्चिक और मीन राशियों के लिये माना जाता है।

मेष राशि शरीर से सम्बन्धित राशि है और इस राशि के लिये बुद्धि की दाता सिंह राशि तथा भाग्य की प्राप्ति के लिये धनु राशि का प्रयोग किया जाता है,इसे लक्ष्मी प्राप्त करने का कारण शरीर से बल से शरीर के प्रयोग से तकनीकी कारणो से और जमीनी रूप मे खुले में कार्य करने से शरीर के बल से ताकत से शरीर के तकनीकी प्रयोग से प्राप्त करने के लिये कहा जाता है। इस राशि वाले केवल अपनी बाहुबल की बुद्धि से ही लक्ष्मी को प्राप्त करने मे सफ़ल होते है। लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये के बात का और भी गौर करना जरूरी है कि लक्ष्य में जो चल रहा है जिसके सामने लक्ष्य है और वह अन्य स्थानो पर अपने मन को नही भटका रहा है वह ही लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है जिसका लक्ष्य नही है यानी टारगेट ही नही है वह लक्ष्मी को प्राप्त नही कर पाता है और भटकाव का रस्ता ही अपनाता रहता है आजीवन या तो गरीबी मे अपने दिन गुजार लेता है या फ़िर दूसरो के सहारे चलते हुये दरवेश के रूप मे बना रहता है। मेष राशि वालो के लिये सबसे अधिक उन्नति देने वाला और मन बुद्धि अहंकार को सही मायने मे प्रयोग मे लाने के लिये - "ऊँ ह्रां श्रां क्रां ब्रां ग्रां द्रां प्रां भ्रां स्त्रां बाहुलक्ष्मयै नम: स्वाहा" का जाप एक लाख से सवा लाख का करना श्रेष्ठ होता है। दशांश हवन के लिये जायफ़ल का हवन घी के साथ करना चाहिये,साथ मे शहद या शक्कर का प्रयोग भी कर सकते है। यह मन्त्र नाम राशि से ही फ़लदायी होता है चन्द्र राशि या जो नाम संसार मे प्रयोग मे नही लिया जाता है केवल कागजो मे या गुप्त रखा जाता है प्रयोग मे नही लेना चाहिये।

वृष राशि कालपुरुष से भी धन की राशि है और इस राशि के लिये बुद्धि की दाता कन्या राशि और भाग्य की दाता मकर राशि होती है। बुद्धि मे इस राशि वालो को सेवा वाले काम बचत वाले काम कर्जा दुश्मनी बीमारी वाले कामो से बुद्धि का जागृत होना माना जाता है और इस प्रकार की बुद्धि के लिये व्यक्ति को गूढ जानकारी जरूरी होती है वह गूढ जानकारी प्राप्त करने और अपनी बुद्धि को तीक्ष्ण बनाने के लिये लक्ष्मी प्राप्त करने के लिये मंत्र - "ऊँ ह्रीं श्रीं क्रीं ब्रीं ग्रीं द्रीं प्रीं भ्रीं स्त्रीं धनलक्ष्मयै नम: स्वाहा" का जाप एक लाख या सवा लाख का करना चाहिये,दशांश के हवन के लिये घी लौंग पिसी हुयी शक्कर या बूरा से करना चाहिये।

मिथुन राशि काम नाम की राशि है इस राशि के लिये बुद्धि की दाता तुला राशि तथा धर्म और भाग्य को देने वाली राशि कुम्भ होती है। इस राशि वाले जातक जितने छुपे रहेंगे उतने ही गरीब होंगे और जितने अपने को फ़ैला कर रखेंगे उतने ही अमीर होते चले जायेंगे। इस राशि वाले लोगों को बोलने से लिखने से अपने हाव भाव और फ़ैसन आदि से दिखाकर गाने बजाने अदाकारी आदि के कारणो से धन प्राप्त करने के लिये कारण बनते है लेकिन बुद्धि के लिये बेलेंस बनाने की राशि तुला का प्रयोग इन्हे करना बहुत ही जरूरी होता है और धर्म तथा भाग्य के लिये इन्हे मित्रो की तथा अपने से बडे भाई बहिनो को भी साथ लेकर चलना जरूरी होता है इस राशि वालो के लिये सबसे खतरनाक काम तथा धन से दूर जाने का कारण एक और भी माना जाता है कि अगर इस राशि के व्यक्ति किसी प्रकार से दूसरो के निजी जीवन मे झांकने की कोशिश करे या चुगली करने तथा बुराई करने की कारण पैदा करे तो यह बरबाद भी हो जाते है। इस राशि वालो के लिये लक्ष्मी प्राप्त करने का मंत्र है - "ऊँ ह्रौं श्रौं क्रौं ब्रौं ग्रौं द्रौं प्रौं भ्रौं स्त्रौं वायुलक्ष्मयै नम: स्वाहा",इस मंत्र का जाप एक लाख या सवा लाख का करना चाहिये दशांश के हवन मे अगर तगर शहद लौंग बतासे और खीर को मिलाकर करना चाहिये।

कर्क राशि मोक्ष नाम की राशि है व्यक्ति मृत्यु के बाद की गति को भोग कर नये जीवन मे कर्मगति बनाने के लिये प्रवेश करता है,इस राशि वालो को बुद्धि देने के लिये वृश्चिक राशि तथा भाग्य धर्म देने के लिये मीन राशि का फ़ेवर मे होना जरूरी होता है। बुद्धि की दाता वृश्चिक राशि इनके लिये बहुत जरूरी है अगर इस राशि के जातक वृश्चिक राशि को साथ लेकर चलने वाले होते है तो उन्हे धनी बनने से कोई रोक नही सकता है। मृत्यु के बाद की सम्पत्ति बीमा के बाद धन की प्राप्ति लोन लेकर या लोन देकर किये जाने वाले खरीद बेच करने वाले काम खनिज उत्पादनो को व्यापार मे लेकर चलने वाले काम विदेशी लोगो से प्राप्त किये गये धन और उसे प्रयोग मे लाने के काम ब्रोकर आदि के काम संस्था बनाकर किये जाने वाले काम उच्च रूप से देखे जाते है,लेकिन नीच मे रूप मे किये जाने वाले काम डर पैदा करने के बाद किये जाने वाले काम गुप्त सम्बन्ध और वासना से जुडे काम भी देखे जाते है। इस राशि वालो को लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये मंत्र - "ऊँ ह्रीं श्रीं क्रीं ब्रीं ग्रीं द्रीं प्रीं भ्रीं स्त्रीं भोगलक्ष्मयै नम: स्वाहा", इस मंत्र का दशांश हवन घी गुड अरंड की जड से करना चाहिये।

सिंह राशि धर्म नाम की राशि है और यह राशि कालपुरुष से बुद्धि की राशि मानी जाती है। इस राशि वालों के लिये धनु राशि बुद्धि को प्रदान करने वाली होती है और मेष राशि धर्म और भाग्य को पैदा करने वाली होती है इस राशि वाले व्यक्ति कानून राज्य पिता से जुडे काम समाज हित के काम विदेशी यात्रा और विदेश मे धन लगाकर किये जाने वाले इम्पोर्ट एक्सपोर्ट के काम हवाई यात्राओं वाले काम लोकहित के काम ऊंची शिक्षा (डिग्री देने) वाले काम आदि करने के बाद धन को आसानी से प्राप्त कर सकते है। जितना लम्बा सोचने का काम इस राशि वाले करेंगे उतने ही धनवान होते जायेंगे और जितनी कम सोच होगी उतना ही यह गरीब होते जायेंगे,इस राशि वालो को कभी भी मर्यादा और लोकसेवा के प्रति गंदी सोच नही रखनी चाहिये। अक्सर इस राशि वालो के लिये यह भी देखा गया है कि तने वाली फ़सलों से यह अच्छा लाभ उठा सकते है। इस राशि वालो के लिये धन प्रदायक लक्ष्मी का मंत्र -"ह्रौं श्रौं क्रौं ब्रौं ग्रौं द्रौं प्रौं भ्रौं स्त्रौं राज्यलक्ष्मयै नम: स्वाहा", इस राशि वालो को दशांश से हवन करने के लिये घी बतासा अगर चित्रक की छाल अरंड के तने की समिधा से हवन करना चाहिये।

कन्या राशि अर्थ से जुडी राशि है इस राशि का मूल उद्देश्य सेवा वाले कामो को करना होता है,इस राशि के लिये बुद्धि को देने वाली राशि मकर है और भाग्य को देने वाली राशि वृष है। इस राशि वालो के लिये सरकारी क्षेत्र की नौकरी जनता से जुडे काम राज्य में प्रयोग किये जाने वाले धन को संधारण करने वाले काम दवाइयों के काम पुलिस से जुडे काम साफ़ सफ़ाई वाले काम कर्जा दुश्मनी बीमारी को निपटाने के काम धन को धन से जुडे काम लोगो को अपमान मृत्यु से बचाने के काम अध्यापन के काम आदि करने से लाभ होता रहता है। इस राशि वालो को लक्ष्मी प्राप्त करने के लिये मंत्र - "ह्रां श्रां क्रां ब्रां ग्रां द्रां प्रां भ्रां स्त्रां जयालक्ष्मयै नम: स्वाहा", का जाप करना चाहिये यह जाप एक लाख से सवा लाख तक किया जा सकता है दशांश से हवन करने के लिये शतावर शहद मिश्री घी गोखुरू से करना चाहिये।

अन्य राशियों के लिये ईमेल astrobhadauria@gmail.com से पूंछ सकते है.


Friday, August 10, 2012

भगवान श्रीकृष्ण की गीता मे शक्ति-तत्व

यह सब को भली भांति पता है कि वर्तमान काल मे जिन्दू धर्म का जो जीवित रूप है उसका फ़ल शक्ति सिद्धान्त पर ही टिका है। देश और विदेश के कुछ समालोचको का यह मत है जिसे समय समय पर वे व्यक्त भी करते है और पहले से भी करते रहे है।वैदिक काल मे स्वतंत्र रूप से शक्ति के लिये शाक्त मत की उत्पत्ति हुयी थी और समय पाकर इसने वैदिक धर्म पर अपना अधिकार जमा लिया था। लेकिन समझने के बाद बात ऐसी नही है। शाक्त मत भी उतना ही पुराना है जितना के वेद और और उनकी उत्पत्ति। जीवन का मुख्य उद्देश्य समाज कल्याण की भावना और प्राणी मात्र को उसके अधिकार से दूर नही करना ही माना जाता है।देवताओं के स्वामी इन्द्र को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति करवाने वाली देवी उमा हैमवती को माना जाता है इस बात का विवरण केनोपनिषद मे मिलता है। इस शक्ति का रूप तीन रूप मे मिलता है माया अविद्या और विद्या,लेकिन विश्व की आदि जननी के रूप मे वह मूलप्रकृति कहलाती है। जब हम उसे जगत के कल्याण की नजर से देखते है तो कभी कभी अजीब सा इसलिये लगता है कि शक्ति आसुरी शक्तियों को पहले क्यों पैदा करती है और जब पैदा करती है तो मारती क्यों है ? मारने के बाद शक्ति सन्देश क्या देना चाहती है ? अगर कोई ज्ञानी व्यक्ति इस बात की समालोचना करे तो मेरे ख्याल से एक दिन नही सारी उम्र इस बात की समालोचना मे लग जायेगी। इस बात के लिये शक्ति रूप में व्यक्ति अपनी तरफ़ से तीन प्रकार की शक्तियां अर्जित करने के लिये स्वतंत्र होता है और इन तीन क्रियाओं के मोहजाल मे जाकर ही वह दैव शक्ति और आसुरी शक्तियों को प्राप्त करता है। यह तीन शक्तियां ज्ञान शक्ति इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति के रूप मे जानी जाती है। इन तीनो शक्तियों मे ज्ञान की शक्ति आने से इच्छा शक्ति संभाल ली जाती है। और इच्छा शक्ति के संभाले जाने के बाद क्रिया शक्ति के अन्दर मोह भय और लोभ जैसी बाते दूर होकर कर्तव्य का ही आलेख रह जाता है। शक्ति सिद्धान्त के अनुसार ही प्रकृति को शक्ति का भंडार बता दिया गया है। प्रकृति के एक एक कण मे एक महान खजाना भरा हुआ है। कण से अणु और अणु से परमाणु के नजदीक पहुंचने के बाद ही ऐसा लगने लगा है कि आज का विज्ञान शाक्त सिद्धान्त के नजदीक पहुंचता जा रहा है। अब जो बात सामने रह जाती है कि शक्ति कितनी है और उसकी मात्रा या इसका समय कितना है ? इस बात की खोज की गयी तो पता लगा कि तत्व को बरबाद समझना बेकार की बात है कारण तत्व कभी खत्म नही होता है। गर्मी सर्दी की तरफ़ भाग जाती है और सर्दी गर्मी की तरफ़ पानी पानी मे वायु वायु मे पृथ्वी पृथ्वी मे विलीन हो जाती है। इसी भौतिक विज्ञान के साथ साथ अगर जीव विज्ञान और मनोविज्ञान को भी शामिल कर लिया जाये तो यह ज्ञान अटल शक्ति के रूप मे सभी को फ़लीभूत कर फ़ायदा दे सकता है। सांख्य शास्त्र का भी विश्लेषण किया गया तो वह ईश्वर की इस प्रकृति रूपी सत्ता को नही नकारता है और यह भी कहता है कि ईश्वर की सत्ता रूपी प्रकृति की सीमा को भी आकलन मे नही लाया जा सकता है।

जब भी कोई कारण बनता है तो वह कारण शक्ति के रूप मे देखा जाता है,लेकिन कारण शक्ति बिना प्रकृति की शक्ति के बन ही नही सकती है। इसी प्रकृति को परमेश्वर के रूप मे माना जाता है। शक्ति शब्द प्रत्यक्ष रूप से गीता मे भगवान श्रीकृष्ण नही दिया है,गीता मे केवल प्रकृति और माया के साथ साथ गुण को शक्ति के रूप मे देखा गया है। तीसरे अध्याय के पांचवे श्लोक मे कहा गया है - "कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै", अर्थात बिना किसी सन्देह के प्रकृति जो गुण उत्पन्न करती है उसी के वश मे रहकर कर्म किया जाता है। इसी प्रकार से अठारहवे अध्याय मे चालीसवां श्लोक भी लिखा है - "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुन:। सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:॥" अर्थात धरती और स्वर्ग के देवताओं यानी जलचर थलचर नभचर जीवो आदि मे कोई ऐसा नही है जो प्रकृति के तीन गुणों सत रज तम से पूर्ण नही हो। इस प्रकार से प्रकृति से गुण पैदा होते है और उनसे हमारी क्रियायें पैदा होती है। गीता के तेरहवे अध्याय मे भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति और पुरुष का विस्तार से वर्णन किया है। उसमे साफ़ उन्होने बताया है कि पुरुष अथवा जीव इस शरीर मे स्थित होकर दुख और सुख के गुणो को प्रयोग मे लेता है,इसी अध्याय मे कहा गया है कि पुरुष और प्रकृति दोनो ही सनातन है इनकी कोई न आने की सीमा है और न ही समाप्त होने की सीमा है। प्रकृति के गुणो से सुख दुख और जीवन के कारण पैदा होते है। यह सब गुणो के संसर्ग मे रहने के कारण उसी प्रकार से हो जाता है जैसी प्रकृति व्यक्ति को मिलती है। गीता के सातवे अध्याय के नवे श्लोक मे कथन है कि जीव मन और इन्द्रियों के द्वारा विषयों को भोगता है,वह एक शरीर से दूसरे शरीर मे पीछे के भोगो को लेकर उसी प्रकार से चला जाता है जैसे हवा फ़ूलो की खुशबू को लेकर दूसरे फ़ूलो की तरफ़ चली जाती है। इसी प्रकार से हर जीव के कर्मो की भिन्नता भी प्रकृति के द्वारा ही निश्चित की जाती है,जो व्यक्ति की पूर्व जीवन की इच्छाये थी उन इच्छाओ को भोगने के लिये जीव की गति बनती है।
इसी प्रकार से जो भी प्रकृति की शक्ति से निश्चित किया गया है वह करना ही होता है जैसे उन्होने अठारहवे अध्याय में उनसठवे श्लोक मे लिखा है-" मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्षति",अर्थात तूने जो प्रण किया है वह झूठ है,प्रकृति तुझसे युद्ध जरूर करवायेगी"।
चौदहवे अध्याय के चौथे श्लोक मे लिखा है - सर्व यौनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता॥’"अर्थात जितनी भी जीवो की मूर्तियां है या शरीर रूप मे जीव है,उनकी तीनो गुणो से युक्त माया तो माँ है,और मै बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ,यानी परमात्मा प्रकृति के स्वामी और शासक भी है,और सामने नही आकर अपने को अद्रश्य भी किये हुये है वह केवल प्रकृति रूपी शक्ति का कारण ही जाना जा सकता है। गीता के नवे अध्याय मे योगमाया को अपनी शक्ति के रूप मे भी प्रस्तुत किया है। "पश्य मे योगमैश्वरम" के अनुसार योगीश्वर की शक्ति भी प्रकृति की देन है। भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति योगमाया के रूप मे राधा का वर्णन किसी भी शास्त्र मे नही किया गया है,भागवत जैसे महापुराण मे भी राधा के लिये नही बताया है,जबकि यह सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण हमेशा नंगे पांव रहे,कभी सिले हुये वस्त्र नही धारण किये,उम्र की चाल साल तक ही गोकुल मे रहे,केवल चौसठ दिन मे सभी विद्यायें सीख ली,ग्यारह साल और पचपन दिन वृन्दावन मे रहे,राधा का नाम वेद व्यास ने इसलिये नही लिखा है क्योंकि योगमाया के रूप मे राधा व्यास जी गुरु है। अध्याय तेरह मे बारहवे श्लोक मे साफ़ लिखा है कि जो लोग आध्यात्म से नही जुडे होते है वे शरीर को ही आत्मा समझना शुरु कर देते है,साक्षी महेश्वर परमात्मा आदि का रूप गीता मे शक्ति को प्रकृति के रूप मे ही बताने के लिये किया गया है।

Friday, May 11, 2012

कैसे शुभ बनाया जाता है समय ?

जीवन मे दिन रात धूप छांव सर्दी गर्मी सुख दुख सभी समान मात्रा मे आते है और अपने अपने समय मे अपना अपना असर देकर चले जाते है। समझदार अपने समय को सही रूप मे व्यतीत कर लेते है और नासमझ लोग सुख के समय मे सुखी रहकर दुख के समय मे दुखी बने रहते है। सुबह को जागने के बाद नये दिन की शुरुआत होती है। दिन की शुरुआत सही होने पर पूरा दिन सही निकलता है। दिन की शुरुआत ही खराब हो जाये तो पूरा दिन ही खराब हो जाता है।

आजकल के भागम भाग समय मे आम आदमी की नींद पूरी नही हो पाती है और वह नींद पूरी नही होने के कारण दिन भर चिढचिढापन लिये घूमता रहता है,उसे हर काम की जल्दी होती है और वह अपने काम को या तो समय से पूरा कर लेता है या फ़िर किये जाने वाले काम को झल्लाहट की बजह से काम पूरा होने से पहले ही समाप्त कर देता है। उसे अपने को चिन्ता से दूर रखने के लिये कई प्रकार के कृत्रिम साधनो का प्रयोग करना पडता है उन कारणो मे तामसी चीजो का सेवन करना अधिक परेशान होने के कारण घर से दूर रहना और अपनी इच्छाओ की तृप्ति के लिये कोई भी गलत काम कर जाना और उसकी सजा को भुगतना एक आम बात हो गयी है।

शिक्षा के समय आधुनिक एम्यूजमेंट के साधनो से मन के विचलित होने से और एक दूसरे की प्रोग्रेस को देखकर अधिक पनपने के कारणो को अपनाने से एक दूसरे के हित की बात को अनदेखा करने से यहाँ तक के अपने ही परिवार को व्यवसाय की द्रिष्टि से देखने के कारण दिमाग का उत्तेजित हो जाना और जो नही करना है उस काम को कर जाना आदि बाते मुख्य है।

जीवन के तीन मुख्य आयाम है भोजन नींद और कार्य,इन तीनो आयामो को समय से पूरा करने के लिये इनके लिये समय का विभाजन करना बहुत जरूरी होता है। भोजन से शरीर शक्ति नींद से इच्छा शक्ति और कार्य से धन शक्ति का बढना होता है,अगर इन तीनो आयामो को सही रूप से सन्तुलित मात्रा मे प्रयोग किया जाता है वही अपनी पूरी उम्र जीता भी है और सभी सुख भोगता भी है।

सुबह को जागने के बाद अपनी स्वांस पर ध्यान दीजिये,किस नासाग्र से अधिक वायु प्रवाहित हो रही है,दाहिने बहने वाली वायु स्त्रियों को सम्पूर्ण दिन की खुशी को सूचित करती है और बायें नासाग्र से बहने वाली वायु पुरुष वर्ग को पूरे दिन की खुशियों के लिये सूचित करती है। अगर विषम प्रवाह है तो उसे सम बनाने के लिये विरोधी करवट को लेकर बगल के नीचे तकिया आदि लगाकर वायु को सम किया जा सकता है।

सुबह को जागने के बाद उठने पर पहले अपने कर कमल को ध्यान से देखने पर कर्म के अधिकारी की प्रथम पूजा मान ली जाती है,दोनो हाथो को मिलाकर देखने के बाद अपने माथे से दोनो हाथो को लगाकर उठना चाहिये। जिस नासाग्र से वायु प्रवाहित हो रही है उस तरफ़ के पैर को सबसे पहले भूमि से स्पर्श करना चाहिये।

आजकल के समय मे लोग चाय को पीने के बाद ही बिस्तर को त्यागने का कार्य करते है,यह नियम जितनी जल्दी हो छोडने का क्रम अपना चाहिये कारण रात भर शरीर की तन्द्रा अवस्था मे सांस के साथ जो भी विषाणु मुंह मे आये होते है वह अगर पहले साफ़ नही किये गये तो वे वापस शरीर मे जाने के बाद खून के साथ मिलकर उत्तेजना और चिन्ता को प्रकट करने के लिये अपना काम उसी प्रकार से करने लगेंगे जैसे एक एस्प्रिन की गोली खाने के बाद कोशिकाओं का सुन्न हो जाना। जागने के बाद सुबह के क्रियाओं से निवृत होकर चाय आदि का सेवन करना ठीक होता है,सुबह की चाय जैसे भी अच्छी बने उसे बनाने की कोशिश करनी चाहिये,कहावत भी है कि "चाय खराब तो सुबह खराब और दाल खराब तो दिन खराब,पत्नी खराब तो जीवन खराब" सुबह को किसी प्रकार की लेन देन की चिन्ता नही करनी चाहिये।

भोजन आदि के मामले मे भी ध्यान रखना जरूरी है कि सुबह को अगर गरिष्ठ भोजन को कर लिया गया तला भुना या देर से पचने वाला भोजन लिया गया तो शरीर की शक्ति उसे पचाने के लिये अपना काम करने लगेगी बाकी के काम को करने के लिये आलस का सामना करना पडेगा। इसलिये बहुत ही हल्का नास्ता करने के बाद ही काम पर निकलना चाहिये। सुबह को घर के सभी सदस्यों से प्रेम से बोलना चाहिये वह चाहे निजी हो या बाहरी प्रेम से सुबह को बोलने के बाद उनके मन मे आदर का प्रभाव दिन भर भरा रहेगा और उनकी सोच भी अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती रहेगी।

Wednesday, May 9, 2012

चमत्कारी होता है गोमती चक्र

गो का रूप गाय के लिये माना जाता है और उसे गो भी कहा जाता है,गाय को लक्ष्मी के रूप मे भी देखा जाता है और शुक्र ग्रह का कारक भी माना जाता है। नदियों के किनारे पर जहां गाय पानी पीती है और उनके जुगाली करने वाले फ़ैन का कुछ भाग पानी मे बह जाता है और वह फ़ैन नदी मे पडने वाले छोटे छोटे भंवर मे जाने के बाद  गोल गोल घूमता रहता है कालान्तर मे उस घूमने वाली क्रिया मे नदी के पानी के अन्दर के पत्थरो रेत आदि के कण भी उस फ़ेन मे मिल जाते है और वह फ़ैन एक चक्र का रूप धारण कर लेता है वही चक्र पानी के अन्दर बैठ जाते है और पानी की बहाव और तल आदि आदि से धीरे धीरे खिसक कर तथा नदी का पानी सूखने के बाद यह नदी की रेत मे मिल जाते है यही गोमती चक्र के रूप मे जाने जाते है। 

गोमती चक्र को दक्षिण मे गोमथी चक्र के नाम से भी जाना जाता है और संस्कृत मे धेनुपदी के नाम से भी जाना जाता है प्राचीन काल मे गोमती चक्र का प्रयोग यज्ञ की वेदी के चारो तरफ़ लगाया जाता था,तथा राज्याभिषेख के समय इसे राजसिंहासन पर भी छत्र के ऊपरी भाग मे लगा दिया जाता था। गोमती चक्र के प्रति कहा जाता है कि किसी के पास अगर चार गोमती चक्र है तो वह किसी भी प्रकार की ऊपरी हवा से बचा रह सकता है और वास्तु वेध के लिये भी इसे चार की संख्या मे मुख्य दरवाजे के ऊपर लाल कपडे मे बांध कर रखा जाता है। इस क्रिया से आसुरी शक्तियों का घर मे रहना नही हो पाता है।

गोमती चक्र की बनावट को देखा जाये तो उसके ऊपर चिकने भाग पर हिन्दी के ७ का अंक बना मिलता है,वर्तमान के ज्योतिषियों के अनुसार यह अंक राहु का अंक कहा जाता है और पानी की वस्तु जिसे चन्द्रमा का रूप दिया जाता है उसके अन्दर इस अंक के होने से यह राहु कृत प्रभावो को दूर रखने के लिये अपनी युति को प्रदान करता है साथ ही बेकार की शंका को दूर रखने मे सहायक होता है,जिनकी कुंडली मे राहु चन्द्र की युति होती है वह इसे चांदी की अंगूठी या पेंडल मे बनवाकर धारण कर सकते है।

जो स्त्रियां नपुंसकता की श्रेणी मे आती है और सन्तान पैदा करने मे असमर्थ होती है वे कमर मे कनकती मे सात  गोमती चक्र लगवा कर धारण करने के बाद सन्तानहीनता से दूर होती देखी गयी है। ग्रामीण लोग गोमती चक्र को  दूध वाले जानवरो के गले मे लाल कपडे मे बांध कर रखते है जिससे दूध देने वाले जानवर बुरी नजर से बचे रहते है। कृषक इसे अपने खेत के चारो कोनो मे दबाकर रखते है जिससे मान्यता है कि खेत की फ़सल मे कीडा आदि नही लगता है और बीमारी आदि से बचने के बाद फ़सल अच्छी पैदा होती है.

गोमती चक्र की भस्म शहद मे मिलाकर पैरो के नाखून मे लगाने के बाद वात का दर्द दूर होता देखा गया है। साथ ही पैर के अंगूठे मे लगाने के बाद नेत्र ज्योति भी बढती देखी गयी है।

Monday, May 7, 2012

सफ़ेद कनेर और उसका तांत्रिक प्रयोग

कनेर का पेड अक्सर कम पानी वाले स्थान पर मिल जाता है यह तीन प्रकार का होता है पीला कनेर मजबूत मिट्टी मे पाया जाता है लाल कनेर पठारी भूमि मे मिलता है और सफ़ेद कनेर अधिकतर रेगिस्तानी इलाके मे मिल जाता है।

कनेर का पेड जहरीला होता है उसकी छाल फ़ल फ़ूल पत्ती आदि को तोडने पर दूध निकलता है वह दूध आक के दूध की तरह से जहरीला होता है। कनेर के पत्ते लम्बे और पतले होते है छाया वाले पेडो की जगह पर लगाया जाता है। पीले वाले कनेर के नीचे अक्सर सांप रहते है और लाल कनेर के पास मे जहरीले जानवर जैसे छिपकली बिच्छू आदि पाये जाते है। सफ़ेद कनेर के पास सफ़ेद चीटियां अधिक पायी जाती है और उनके काटने पर एलर्जी जैसे रोग हो जाते है जो खांसी जुकाम आदि लगाने के लिये माने जाते है उनका जहर काफ़ी समय तक के लिये खून के अन्दर बना रहता है और अधिक पैदा होने के कारण खून के थक्के बनाने और ह्रदय रोग का आभास करवाने लगता है,इस प्रकार के व्यक्ति के पसीने मे भयंकर बदबू आने लगती है।

आयुर्वेद मे सफ़ेद कनेर के कई आयुर्वेदिक कारण बताये गये है जैसे जलने पर उसकी हरी पत्तियों को सरसों के तेल मे जलाने के बाद ठंडा करने के बाद जले हुये स्थान पर लगाने से एक तो छाले जल्दी ठीक हो जाते है और जलने के बाद पडे हुये सफ़ेद दाग भी ठीक हो जाते है। इसी प्रकार का उपयोग सूखे छुहारे के साथ हरे पत्ते छाल फ़ूल फ़ल कुचल कर जलाने के बाद ठंडा करने के बाद लगाने से सफ़ेद दाग भी ठीक होते देखे गये है।

पालतू जानवरो मे कीडे लग जाने के कारण और त्वचा वाली बीमारियां हो जाने के बाद अरंडी के तेल मे हरे पत्तो को जलाकर उनकी राख मिलाकर लगाने से ठीक हो जाते है।

तंत्र शास्त्र मे सफ़ेद कनेर के लिये कहा जाता है कि अमावस्या की आधी रात को इस पेड के नीचे बैठ कर शिव आराधना करने से फ़लदायी होती है। इस कनेर के फ़ूलो की माला शिवजी को पहिनाने से मनोवांछित फ़ल मिलने का कारण बनता है। सफ़ेद कनेर के फ़ूलो को हल्दी के साथ पीस कर माथे पर तिलक करने से जगत वशीकरण का रूप भी माना जाता है। भगन्दर और गुदा वाली बीमारियां भी इस कनेर के रस से ठीक होती देखी जाती है।

जिस घरो में ऊपरी शक्तियों का अधिक प्रभाव होता है उनके दरवाजे पर गमले मे लगाने के बाद ऊपरी हवाये दूर रहती है। जो लोग राहु चन्द्र शनि की युति मे पैदा हुये होते है और वृश्चिक राशि का असर उनके जीवन मे होता है तो उन्हे रोजाना इस कनेर के पेड पर दूध मिला जल चढाने के बाद शान्ति मिलती देखी गयी है.

Thursday, April 26, 2012

महामृत्युंजय मंत्र का पूर्ण विधान

महामृत्युंजय मंत्र के लिये कई प्रकार की धारणाये मिलती है और अधिकतर केवल मंत्र को ही बताया गया है तथा बिना विधान के उसके जाप के बाद भी फ़ल प्राप्ति नही होती है तो मंत्र को दोष देकर लोग अलग हो जाते है या काल कर्म ईश्वर को दोष देकर दूर हट जाते है। महामृत्युंजय संजीवनी बूटी की तरह से अपना काम करता है और अपनी अवधि नौ महिने तक काम भी करता है,लेकिन विधान से इसे किया जाय तो अन्यथा केवल वाणी की विग्यता के अलावा और कुछ भी हासिल नही होता है,चालाक पंडित अपनी दक्षिणा लेकर चलते बनते है फ़ल मिले या न मिले यह व्यक्ति के भाग्य पर निर्भर होता है।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिर जीविन:॥
सप्तैतान संस्म्रेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्ट मम।
जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जित:॥
अर्थात अश्वत्थामा बलि वेदव्यास विभीषण हनुमान कृपाचार्य परशुराम तथा मार्कण्डेय मुनि को जो प्राणी प्रात:काल मे स्मरण करता है वह शतायु होता है।
यह आठों लोग अमर है.
कथा इस प्रकार कही जाती है:-

मुकुन्ड मुनि के कोई संतान नही थी,संतान की प्राप्ति हेतु मुनि ने सप्त्नीक भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव उनकी तपश्या से अत्यन्त प्रसन्न हुये और वर मांगल्ने के लिये कहा। मुनि ने पुत प्राप्ति की कामना व्यक्ति की तो भगवान शिव बोले हे मुने ! तेजस्वी बुद्धिमान ग्यानी चरित्रवान पुत्र चाहते हो तो वह मात्र सोलह वर्ष तक जीवित रहेगा। अग्यानी और चरित्रहीन पुत्र पूर्ण आयु वाला होगा। आप कैसा पुत्र चाहते हो। मुनि ने अल्पायु वाला गुणवान पुत्र ही मांगा। शिव की कृपा से मुनि को गुण सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति हुयी। मुनि ने उसका नाम मार्कण्डेय रखा। 

समयानुकूल उनकी शिक्षा दीक्षा चलती रही। मृत्यु का समय निकट आता जान मुनि चिंतित रहने लगे एक दिन पुत्र ने जब उनकी उदासी का कारण जानना चाहा तो मुनि ने पुत्र को पूरी जानकारी दे दी। मार्कण्डेय को अपनी साधना पर विश्वास था। उन्होने प्रण किया कि मै भगवान मृत्युंजय को प्रसन्न करने के बाद पूर्ण आयु को प्राप्त करूंगा। इस प्रकार बालक मार्कण्डेय विधि विधान से आशुतोष की उपासना मे लग गये। वे लिंग पूजा करके मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करते थे। शिवजी उनकी साधना से प्रसन्न हुये।

सोलहवे साल मे अन्तिम दिन मृत्यु उनके सम्मुख आ गयी। मार्कण्डेय ने उनसे स्तोत्र को पूर्ण करने देने का आग्रह किया परन्तु मृत्यु ने उन्हे ऐसा करने की अनुमति नही दी। जब काल ने मुनि मार्कण्डेय के प्राण हरण करने चाहे तो भगवान शिव लिंग से प्रकत हो गये। यमदेव भगवान से भयभीत होकर चले गये। स्तोत्र की समाप्ति पर प्रसन्न होकर प्रलयंकर ने उन्हे अमरता का वरदान दिया।

स्तोत्र की विधि

रोजाना नित्य कर्म से मुक्त होकर पवित्र स्थान मे लाल ऊन का आसन बिछाकर पूर्व दिशा की तरफ़ मुंह करके अपने सामने चौकी पर शिव प्रतिमा या लिंग स्थापित कर संकल्प करे,संकल्प मे मानसिक धारणा करे धारणा मे यह भाव होना चाहिये कि कष्ट रोग अल्पमृत्यु का आना भयंकर पीडा आदि कि अपने लिये या किसी दूसरे के लिये उसके नाम गोत्र सहित मानसिक स्मरण करे,संकल्प के पश्चात हाथ मे जल फूल और चावल लेकर विनियोग करें। 

विनियोग

ऊँ अस्य श्री महामृत्युंजय मन्त्रस्य वामदेव कहोलवशिष्ठा ऋषय: पंक्तिगायत्र्युषिणगनुष्टप छन्दसि सदाशिवमहामृत्युंजय्रुद्रो देवतां ह्रां (धरती पर विचरण करने वाले कष्ट जिनका पता हो) ह्रीं (पाताली कारण यानी जिनके बारे मे पता नही हो) ह्रौं (उपरत्व भूत प्रेत पिशाच जो दिखाई नही देने वाले हों) शक्ति: श्रीं बीजं महामृत्युंजय प्रीतये ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

(यह कहकर हाथ मे लिये हुये जल और फ़ूल आदि को धरती पर गिरा दें और ऋषयादि न्यास करें)

ऋष्यादिन्यास

वामदेव कहोल वशिष्ठ ऋषिभ्यो नम: शिरसि । (सिर को छुयें)
पंक्तिगायत्र्युषिणगनुष्टुप छन्दांसि नम: मुखे (मुख को छुयें)
सदाशिवमहामृत्युंजयरुद्र देवतायै नम: ह्रदि। (ह्रदय को छुयें)
ह्रीं शक्तये नम: गुह्ये। (गुह्य भाग को छुयें)
श्रीं बीजाय नम: पादयो। (पैरों को छुयें)
विनियोगाये नम: सर्वांगे । (शरीर के सभी अंगो को स्पर्श करें)

करन्यास

ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: त्र्यम्बकम ऊँ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा - अंगुष्ठाभ्याम नम: (दोनो हाथों की तर्जनी उंगलियों से अंगूठों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: यजामहे ऊँ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये मां जीवय बद्ध तर्जनीभ्या नम: (अंगूठों से तर्जनियों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम ऊँ भगवते रुद्राय चन्द्र शिरसे जटिने स्वाहा मध्यमाभ्यं नम: (अंगूठों से दोनो मध्यमा उंगलियों को छुयें)
ऊँ हौं जूं स: भू भुर्व: स्व: उर्वारुकमिवबन्धनात ऊँ भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय ह्रीं ह्रीं अनामिकाभ्याम नम: (दोनो अंगूठों से अनामिका उंगलियों को छुयें).



Wednesday, April 18, 2012

उड्डीस तंत्र

ज्ञानांजन शलाका द्वारा अज्ञानता को दूर कर ज्ञान चक्षुओं को खोल देने वले श्री सदगुरुदेव को नमस्कार है। कैलाश पर्वत की चोटी पर बैठे हुये भगवान शिव से रावण ने निवेदन किया हे प्रभु आप मुझे ऐसी कोई तंत्र विद्या बतायें जिससे क्षणमात्र मे सिद्धि की प्राप्ति हो जाये। भगवान शिव बोले हे वस्त तुमने यह श्रेष्ठ प्रश्न पूछा है अत: लोक हितार्थ मैं उड्डीस तंत्र का वर्णन कर रहा हूँ।

जिसे उड्डीस तंत्र का पता नही है वह दूसरो पर गुस्सा करने के बाद कर भी क्या सकता है वह केवल अपने लहू और आत्मा मे चीत्कार कर सकता है और अपने ही शरीर को जला सकता है अपनी दिन चर्या को बरबाद कर सकता है। जैसे रात मे चन्द्रमा नही हो तो रात बेकार लगती है दिन मे सूर्य नही उदय हो तो दिन बेकार हो जाता है जिस राज्य मे राजा नही होता वह राज्य बेकार होती है वैसे बिना गुरु के कोई भी मंत्र की सिद्धि नही होती है।

पुस्तकों को पढकर किसी भी विद्या का ज्ञान नही होता है बिना गुरु के किसी भी तंत्र का अनुष्ठान हो ही नही सकता है,कलयुग मे जब गुरु की मान्यता ही समाप्त हो जाती है तो तंत्र के नाम पर केवल मदारी जैसे करिश्मे दिखाने से कोई तांत्रिक नही बनता है,गुरु मिलते भी है तो वे केवल अपना भंडार भरने वाले होते है,जो झूठ बोलना जानता हो और मजाक करने के बाद अपनी प्रस्तुति देना जानता हो कलयुग मे वही ज्ञानी और भक्ति से युक्त जान पडता है,इस समय मे भजन और कीर्तन भी चकाचौंध मे किये जाते है जो जितना मोहक और कामुक गाना बजाना नृत्य करना जानता है वही बडा भजन गाने वाला और भक्त कहलाता है।

उड्डीस तंत्र मे षडकर्म का उल्लेख जरूरी है इनके विधिवत अनुष्ठान से मनुष्य कुछ सिद्धिया जरूर प्राप्त कर सकता है जिससे वह अपनी जीविका और घोर जिन्दगी को खुशी जिन्दगी मे बदल सकता है। षटकर्म विधान मे शान्ति कर्म वशीकरण स्तंभन बैरभाव उच्चाटन और मारण आदि षटकर्म कहे गये है। जब मनुष्य अधिक क्रूर व्यक्तियों और समुदाय मे घिर जाता है चारो तरफ़ कलह और मारधाड ही देखने को मिलती है कसाई का काम करने वाले बढ जाते है तो शान्ति कर्म की प्रधानता बताई जाती है इस शान्ति कर्म वाले विधान करने से क्रूर शक्तियां पलायन कर जाती है और खुशहाली आजाती है लोग एक दूसरे के प्रति दया करना शुरु कर देते है। यही शान्ति कर्म जब शरीर मे रोग पैदा होते है ग्रहो का दोष पैदा हो जाता है तो किये जाते है।

जब अपना स्थान बनाने केलिये और अपने को सभी के प्रति सम्मान के भाव मे प्रस्तुत करने के लिये सभी को अपने प्रभाव मे लाने के लिये जो कार्य किये जाते है वह वशीकरण की श्रेणी मे आते है।पति पत्नी मे जब बैर भाव पैदा हो जाये माता पुत्र अलग अलग हो जाये पिता का सहयोग नही बन रहा हो भाई बहिन ही खुद के बैरी हो जाये तो वशीकरण नामक प्रयोग लाभदायी होता है।

जब समस्याये लगातार आगे बढती आ रही हो बैर करने वाले लोग चारो तरफ़ से घेरा डाल रहे हो पुलिस मुकद्दमा अस्प्ताल आदि के कारण लगातार घेरने लगे हो तो स्तम्भन नाम का तंत्र प्रयोग किया जाता है यही प्रयोग वे लोग भी अपनाते है जो अपने साथ के लोगो से आगे निकलने की होड मे अपने प्रभाव को हमेशा रखने के लिये उन्हे पीछे करना चाहते है लेकिन यह पापकर्म के अन्दर आने से उड्डीस तंत्र मे इसका प्रयोग खुद के लिये हानिकारक बन जाता है,जहां कोई बैर से आगे बढने की योजना को बनाता है और छल फ़रेब से आगे निकलने की क्रिया को करता है अनुचित काम करने के बाद वह आगे जाना चाहता है उसके लिये स्तम्भन का कार्य करना हितकर होता है।

जब दो लोग या कई लोग मिलकर किसी के अहित की बात करते है राज्य को गिराने की कोशिश मे होते है किसी दयावान को परास्त करने की योजना को बनाते है किसी एक समुदाय द्वारा हिंसक योजना से किसी अन्य समुदाय को विनाश की योजना आदि बनाने मे जिनका मन लगता है और वे कई लोगो के साथ मिलकर योजना को बनाकर अनुचित काम करना चाहते है या कई ग्रुप मिलकर एक ग्रुप को समाप्त करना चाहते है उनके लिये विद्वेषण तंत्र का प्रयोग किया जाता है जिससे वह इकट्ठे भी नही रह पाते है और वह किसी अन्य के प्रति कभी भी कोई अनुचित काम भी नही कर पाते है।

जब कोई एक स्थान पर रहकर अनुचित कामो मे लगा हुआ है उसके रहते हुये कई लोगो को परेशानी हो रही है वह लोकहित के कामो को तिलांजलि देकर अनैतिक कामो को कर रहा है जिससे समाज परिवार और घर के अन्दर कलह का वातावरण आदि बनता जा रहा है एकता के अन्दर वह व्यक्ति अपनी नीति और चालाकी से दिक्कत को देने वाला है उसके लिये उच्चाटन नामक तंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस प्रयोग के बाद वह दिक्कत देने वाला व्यक्ति दूर चला जाता है और समाज परिवार समुदाय सुरक्षित रह जाता है।

जब एक व्यक्ति लोगो के लिये हिंसा का काम करने लग जाये वह मनुष्य और जीवो को मारने काटने मे ही रुचि को रखना शुरु कर दे उसे दया का नाम ही पता नही हो तथा वह धर्म अर्थ काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थो का विनास करने पर तुल जाये तो उसके लिये जो प्रयोग किया जाता है वह मारण प्रयोग के नाम से जाना जाता है।

षटकर्मो के देवी देवता भी होते है जिनकी उपासना करने से इन कर्मो की सिद्धि प्राप्त होती है। शांति के काम करने के लिये वशीकरण के लिये अपनी वाणी को प्रयोग मे लाने के लिये स्तंभन के लिये लक्ष्मी की उपासना की जाती है। ज्येष्ठा नामक शक्ति की उपासना उच्चाटन के लिये की जाती है,मारण प्रयोग के लिये काली की उपासना की जाती है।

षटकर्मो को करने के लिये दिशा का निर्धारण भी किया जाता है शांति कर्म को करने के लिये ईशान दिशा मे बैठ कर और ईशान मे ही अपने मुंह को करने के बाद आराधना करना चाहिये वशीकरण के लिये उत्तर दिशा की तरफ़ बैठ कर और अपना मुंह भी उत्तर दिशा की तरफ़ करके बैठ कर उपासना करना चाहिये। स्तम्भन के लिये पूर्व दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये विद्वेषण के लिये दक्षिण-पश्चिम दिशा मे बैठकर उपासना करना चाहिये और इसी दिशा मे अपने मुंह को करना चाहिये। उच्चाटन के लिये उत्तर-पश्चिम दिशा मे मुंह करके बैठना चाहिये मारण कर्म के लिये उपासना करने के लिये अग्नि कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा मे बैठ कर और मुंह करके उपासना करना चाहिये।

इन कर्मो को करने के लिये समय का भी निर्धारण किया जाता है। वैसे तो साल मे ऋतुओं का आना जाना होता है लेकिन सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच मे भी छ: ऋतुयें आती जाती है। सूर्योदय से चार घंटे के लिये बसंत ऋतु का आना होता है,फ़िर चार घंटे के लिये ग्रीष्म ऋतु का आना होता है उसके बाद वर्षा ऋतु का आना होता है,फ़िर शरद ऋतु का आना होता है फ़िर हेमंत ऋतु का आना होता है और दूसरे सूर्योदय के समय तक शिशिर ऋतु का आना होता है।

सूर्योदय से चार घंटे की अवधि बसंत ऋतु की होती है इस समय में वशीकरण वाली साधना की जाती है,सूर्योदय के चार घंटे बाद ग्रीष्म ऋतु में विद्वेषण की साधना की जाती है। सूर्योदय के आठ घंटे बाद वर्षा ऋतु के समय में उच्चाटन की साधना की जाती है,सूर्योदय के बारह घंटे बाद मारण क्रिया की साधना की जाती है,सूर्योदय के सोलह घंटे बाद शांति कर्म की साधना की जाती है,सूर्योदय के बीस घंटे के बाद स्तम्भन क्रिया की साधना की जाती है यह साधना किसी भी देश मे किसी भी ऋतु मे हमेशा ही मान्य होती है।

हिन्दू तिथि के अनुसार दूज तीज पंचमी और सप्तमी बुधवार गुरुवार और सोमवार शांति कर्म के लिये प्रयोग मे है गुरुवार सोमवार को आने वाली छठ चौथ त्रियोदशी नवमी अष्टमी दसमी पुष्टि कर्मो के लिये दसवी एकादशी अमावस्या नवमी पडवा व शुक्रवार रविवार को आने वाली पूर्णिमा विद्वेषण हेतु कही गयी है। छठ चौथ आठें विशेष रूप से प्रदोष को यदि शनिवार आता हो तो उच्चाटन करना उचित नही होता है इसी प्र्काअर से अन्धेरी रात की चौदस अमावस्या तिथि और शनिवार या मंगलवार के दिन मारण कर्म करना मना किया गया है,साथ ही स्तंभन के काम हेतु बुधवार या सोमवार तथा पंचमी दसवी और पूर्णिमा तिथि खराब बताई जाती है,जब अनुकूल ग्रह हों तभी शांति पुष्ट और शुभ काम करना चाहिये। जब प्रतिकूल ग्रह हो तब मारण उच्चाटन आदि कार्य नही करना चाहिये इसी प्रकार से रिक्ता तिथियों चौथ नौवीं चौदस मे विद्वेषण व उच्चाटन आदि काम और मृत्यु योग होने पर मारण करना नही बताया गया है।

ज्येष्ठा उत्तराषाढा अनुराधा रोहिणी उतराभाद्रपद मूल शतभिषा पूर्वाभाद्रपद आश्लेषा नक्षत्रों मे स्तंभव मोहन वशीकरण करने मे सफ़लता मिलती हिअ इसी तरह से स्वाति हस्त मृगशिरा चित्रा उत्तराफ़ाल्गुनी पुष्य व पुनर्वसु अश्विनी भरणी आर्द्रा धनिष्ठा श्रवण मघा विशाखा कृत्तिका पूर्वाफ़ाल्गुनी रेवती नक्षत्रों में विद्वेषण व उच्चाटन कर्म करने से सफ़लता मिलती है। दिन के पूर्व भाग मे वशीकरण मध्यभाग में विद्वेषण व उच्चाटन अंतिम भाग में शांति और पुष्ट कर्म प्रदोषकाल शाम के समय मे मारण आदि कर्म करना फ़लदायी नही होता है। सिंह या वृश्चिक लगन मे स्तंभन कर्म कर्क या तुला लगन मे उच्चाटन कर्म तथा मेष कन्या धनु मीन लगन मे वशीकरण शंति पुष्टि मारण उच्चाटन शत्रुदमन आदि करना खराब बताया गया है।

तत्व के उदय होने पर कौन सा कर्म करना उचित रहता है वह इस प्रकार है शांति कर्म जल तत्व के उदय होने पर वशीकरण अग्नि तत्व के उदय होने पर स्तंभन भूमि तत्व के उदय होने पर विद्वेषण आकाश तत्व के उदय होने पर उच्चाटन वायु तत्व के उदय होने पर मारण कर्म भूमि तत्व के उदय होने पर करना उचित नही होता है इसी तरह तत्व उदय के बारे मे जानकार तत्संबन्धी तत्वानुसार मंडल बनाकर कर्म करने से सिद्धि मिलती है। वशीकरण शोभन कार्यो के लिये लाल रंग के देव देवी शांति विष प्रभाव को दूर करने के लिये पुष्टि कर्म के लिये सफ़ेद रंग के देव का मनाया जाना उचित होता है,स्तम्भन कार्य के लिये पीले रंग के देव देवी उच्चाटन कर्म के लिये धुयें के रंग के देवी देवता उन्माद कर्म के लिये भी लाल रंग के देवी देवता मारण कर्म के लिये काले रंग के देवी देवता का ध्यान करना उचित होता है।

मारण कर्म मे खडे हुये रूप में उच्चाटन काल मे सोते हुये अन्य कर्मो मे सामने बैठे हुये देवता का ध्यान करना चाहिये। सात्विक काम मे सफ़ेद देवता का सामने बैठे हुये रूप का ध्यान करना ठीक होता है इसी प्रकार किसी प्रकार के राजसी काम पीले व लाल रंग के व काले रंग के देवता को ध्यान मे रखना चाहिये तामसिक काल मे वाहन पर सवार काले देवता का ध्यान करना चाहिये मोक्षकामी को सात्विक राज्य की आशा वाले को राजसी रूप का ध्यान रखना चाहिये इसी प्रकार से शत्रु विनास पीडा हरण व समस्त विघ्न विनाश हेतु देवता का तामसिक रूप का ध्यान करना चाहिये।

रुद्र मंगल गरुड गंधर्व यक्ष सर्प किन्नर पिशाच भूत असुर इंद्र विद्याधर देवता आदि सभी मंत्रो के अधिष्ठाता देवता है। एक वर्ण का मंत्र कर्तरी यानी इच्छा को खत्म करने वाला और कमजोर दो वर्ण का मंत्र सूची यानी बिना मांगे ही दुख को देने वाला तीन अक्षर का मंत्र डंडे का काम करने वाला चार अक्षर का मंत्र मूसल का काम करने वाला पांच अक्षरो का मंत्र क्रूर शनि के रूप में छ: अक्षर का मंत्र लगातार विचार मे मग्न रहने वाला सात अक्षर का मंत्र कांच की तरह तोड देने वाला आठ अक्षर का मंत्र कांटे की तरह से चुभने वाला नौ अक्षर का मंत्र पत्थर की तरह से कठोर दस का शक्ति ग्यारह का फ़रसे जैसा बारह का चक्र तेरह का दो भालो के रूप मे चौदह का नाराच पन्द्रह का भुसुंडी अस्त्र सोलह का पद्म यानी कमल के रूप का माना जाता है। वाणी को समाप्त करने मे कर्तरी भेद कर्म मे सूची भजन मे मुदगर अरुचि पैदा करने में मूसल बन्धन में श्रंखल विद्वेषण मे डंडा सभी कामो मे चक्र उन्माद मे कुलिस सैन्य भेदन में नाराच मारण कर्म में भुसुण्डी शांति कर्म मे पदम मंत्र का उच्चारण करने मे अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

पचास अक्षरो का मंत्र जो देवी माँ के रूप मे प्रयोग किया गया हो वह सभी प्रकार के भय हरने वाला कहा जाता है जो व्यक्ति जिस किसी कामना से किसी प्रकार का मंत्र जाप करता है उसकी वह मनोकामना पूरी होती है मंत्र के प्रारम्भ मे आने वाला नाम पल्लव कहलाता है मारण विनाश ग्रह भूत आदि के शमन के लिये उच्चाटन विद्वेषण कामो के लिये पल्लव युक्त मंत्र का ही जाप किया जाता है। मंत्र के आखिर मे आने वाला नाम योजन मंत्र कहलाता है इस मंत्र का जाप वशीकरण प्रायश्चित मोहन दीपन आदि कामो मे प्रयोग किया जाता है इनके अतिरिक्त स्तंभन व विद्वेषण कर्मो मे भी इस मंत्र का जाप किया जाता है नाम के प्रारम्भ मध्य और अंत मे मंत्र आने से इसे रोध मंग कहा जाता है अभिमुखीकरण सभी प्रकार की व्याधियों बुखार ग्रह प्रकोप विष आदि के प्रभाव को दूर करने के लिये रोध मंत्र का ही जाप किया जाना चाहिये। नाम के आदि मध्य अंत मे जो मंत्र आता है वह ग्रंथन मंत्र कहलाता है,इस मंत्र का जाप शांति कर्म मे किया जाता है नाम के प्रारम्भ मे अनुलोम व अंत मे विलोम रूप से जो मंत्र आता है वह संपुट मंत्र कहलाता है कीलन कर्म मे संपुट मंत्र का जाप किया जाता है इसके अलावा स्तंभन मौत को दूर करने रक्षा करने जैसे कर्म भी इस मंत्र का जाप करने से सिद्धि मिलती है।

प्रारम्भ मे पूर्ण मंत्र बोलकर साध्य का नामोच्चारण कर फ़िर प्रतिकूल भाव से पूर्ण मंत्र का उच्चारण करने को भी तंत्रशास्त्र मे संपुट मंत्र ही कहा गया है इसी प्रकार मंत्र व साध्य नाम के दो वर्णों का क्रमानुगत उच्चारण ही सविदर्भ मंत्र कहलाता है इस मंत्र का उपयोग वशीकरण आकर्षण व पुष्टि कर्म आदि मे करने से सिद्धि प्राप्त होती है। बन्धन उच्चाटन व विद्वेषण मे हुं अरिष्ट ग्रह शांति हेतु हुं फ़ट पुष्टि शांति कर्म हेतु वौषट हवन करते समय स्वाहा पूजन काल मे नम: का उच्चारण किया जाना चाहिये,शांति व पुष्टि कर्म मे स्वाहा वशीकरण मे स्वधा विद्वेषण मे वषट आकर्षण में हुं उच्चाटन में वैषट मारण में फ़ट बीजमंत्र का उच्चारण किया जाता है।

आगे जारी है ...........................!


Thursday, January 27, 2011

गुरु के विभिन्न उपाय

गुरु के बारे में मैने पहले भी लिखा है,और समझाया है कि गुरु जीव का कारक है,गुरु के जिन्दा रहने पर जातक की जिन्दगी देखी जाती है और गुरु के मरने पर जातक की मृत्यु देखी जाती है,लेकिन गुरु कभी मरता भी नही है। गुरु अपने रूप को परिवर्तित करने के बाद किसी न किसी रूप में फ़िर से जीवन की गति को देने लगता है। जीव का रहना भावना पर निर्भर रहता है,जैसी जीव की आजीवन भावना रहती है जीव उसी भावना के वसीभूत होकर दूसरी योनियों में अपना जीवन धारण कर लेता है और जैसे कर्म पिछले जन्म में किये गये है उन्ही के अनुसार जीव को कर्मगति के अनुसार फ़ल मिलने लगते है। ऐसा शास्त्रों में भी लिखा है और महापुरुषों की भी यही सोच है। कई लोगों का विचार होता है कि जीव इसी जन्म में अपने कर्मों का फ़ल प्राप्त कर लेता है,यह किसी हद तक सही भी है कि जो भी भौतिक कार्य किये जाते है वे भौतिक रूप से तो फ़टाफ़ट फ़ल देने वाले होते है,लेकिन जो कार्य मानसिक रूप से सोचे जाते है,लगातार चिन्ता करने के बाद अपने ह्रदय में धारण कर लिये जाते है,वे ही अपने अपने अनुसार फ़ल देने के कारक माने जाते है। और भावना के अन्दर जो भी लगाव दिमाग में रहता है उसी भावना के अनुसार जन्म लेना पडता है,कथाओं में जड भरत की कथा इसका उदाहरण है कि पहले वे तपस्या में थे लेकिन एक हिरन के बच्चे में मोह होने के बाद उन्हे हिरन के रूप में जन्म लेना पडा और जब मोह टूटा तो वापस मनुष्य रूप में प्रकट होना पडा।

गुरु सांस का कारक है और सांस के चलने तक जीव का जिन्दा रहना माना जाता है। गुरु के स्वभाव के लिये अन्य ग्रह अपने अपने अनुसार गुरु पर प्रभाव देते है जैसे गुरु अगर डाक्टरी राशि में है तो जीव के पास चिकित्सा के कारण मिलते है और जीव अपने अन्दर चिकित्सा वाले कारण और बैंक जमा पूंजी दुश्मनी बनाने और निकालने वाले कारण रोजाना के कार्य करने के मामले बीमारी आदि के कारण जानने और निकालने की क्षमता रखता है। इसी के साथ गुरु अपने गोचर से जातक के जिस भी भाव मे गोचर करेगा वह सम्बन्धित भाव के अनुसार अपने अपने कारणों से उन्ही दोषों की वृद्धि भी करेगा और दोष निकालने की शक्ति भी देगा। प्राणवायु के रूप में वह अपनी शक्ति के अनुसार उन्ही कारकों को अपने अन्दर ले जायेगा जो जातक को शक्ति देने या शक्ति को बरबाद करने के लिये माने जा सकते है। जैसे कन्या का गुरु अगर तुला में जाता है तो वह अपने अनुसार तुला राशि के अन्दर व्याप्त रोग या तो बढायेगा या घटायेगा। वह रोग या तो शादी सम्बन्ध वाले होंगे या खुद के व्यापार करने की क्षमता वाले होंगे इसके साथ या तो साझेदार से कर्जा दुश्मनी बीमारी का कारण पैदा करेगा या इन्हे सुलझाने के लिये सहायक के रूप में अपना बल देगा। वही गुरु अगर जातक के धनु राशि वाले भाव में जायेगा तो पहले वह भाव के फ़लों में वृद्धि या कमी करेगा,उसके बाद धनु राशि के स्वभाव कार्य और अन्य कारकों के प्रति अपने अपने अनुसार फ़लो में अपना असर प्रदान करेगा,जैसे कन्या राशि का गुरु अगर धनु राशि में गोचर करेगा तो धर्म कानून विदेश यात्रा ऊपरी ताकते देवी देवताओं की स्थापना या अन्य प्रकार के विरोधी कार्य कर सकता है,या विदेश भेज सकता है या विदेश से बुला सकता है आदि बाते समझी जा सकती है उसी के अनुसार अगर गुरु जातक के दूसरे भाव है तो धन और कुटुम्ब वाली बाते तथा भाव से सम्बन्धित बातों का फ़ल प्रदान करेगा,धनु राशि है तो बाते धन और कुटुम्ब वाली कानून तकनीक और विदेश से सम्बन्धित धन ऊंची शिक्षा के लिये किये जाने वाले खर्चे या ऊंची शिक्षा के लिये किये जाने वाले खर्चे के लिये माना जा सकता है।

गुरु जब राहु के साथ आजाता है तो जीव की गति बिगडने के लिये कई तरह के कनफ़्यूजन पैदा होने लगते है,वे सभी कनफ़्यूजन अपने अपने अनुसार अलग अलग कार्यों और जातकों के प्रति अपनी अपनी सोच को लेकर होते है,जो भी साथ वाले लोगों से कार्य किये जाते है या तो वे शंका वाले होते है,या फ़िर विश्वास में कमी करने वाले होते है,या फ़िर आपसी कनफ़्यूजन के कारण उनके अन्दर कई प्रकार की शंकायें बनती रहती है। राहु के द्वारा कनफ़्यूजन आने के बाद चलने वाले रिस्ते भी बिगडने लगते है,उन रिस्तों के अन्दर कई प्रकार के भाव अपने आप प्रकट होने लगते है,राहु की सिफ़्त के अनुसार जीव के साथ कई घटनायें अपने अपने अनुसार अचानक होनी शुरु होती है,और उन घटनाओं से जीव का अगर वह संभला नही तो अन्त भी हो सकता है और वह समय के अनुसार अस्पताल या अन्य इसी प्रकार के स्थानों में अपने जीवन को निकाल सकता है। राहु के साथ गुरु होने से पुराणो और महापुरुषों के द्वारा बालारिष्ट योग की कल्पना भी की गयी है। इस कल्पना के द्वारा राहु तभी गलत फ़ल देता है जब वह या तो वृश्चिक राशि का होता है या त्रिक भावों में जन्म कुंडली में होता है अन्य स्थानों की गति के अनुसार अक्सर राहु अच्छे फ़ल ही प्रदान करता है और जातक को अचानक बचाने की और मारने की क्रिया भी करता है।

Sunday, December 19, 2010

गुरु का जन्म के शनि के साथ गोचर

गुरु जीव का कारक है और गुरु के द्वारा ही व्यक्ति की प्रोग्रेस और जीवन की गतियों के लिये ज्योतिष से देखने की प्रथा है,वैसे वैदिक ज्योतिष का फ़ार्मूला कुछ अलग ही है,और सभी ग्रहों को अपने अपने अनुसार प्रयोग में लिया जाता है। शनि कर्म का कारक ग्रह है और रहने वाले स्थान आदि के लिये भी अपना कार्य करता है,शनि की स्थिति जिस राशि नक्षत्र और उसके पाये के स्वामी के अनुसार होती है उसी प्रकार का बदलाव गुरु भी अपनी गोचर की स्थिति से करता है। जैसे शनि अगर कन्या राशि का है और वह मंगल आदि के साथ विराजमान है तो उसके लिये यह मानना जरूरी है कि जो भी कार्य उसके द्वारा किये जायेंगे वे गूढ होंगे और वह अपने लिये रहने या भोजन के साधनों को खोजने के लिये अस्पताल या किसी संस्था या भाई के प्रति समर्पित होने के लिये अपना बल देगा। गुरु का गोचर अगर तुला राशि के शनि के साथ होता है तो व्यक्ति के लिये मारकेटिंग या व्यापारिक संस्थान या कानूनी क्षेत्र मे जाने के लिये भी इंगित करता है,इसके अलावा जैसे वृश्चिक राशि का शनि है तो गुरु अपने प्रभाव से जातक को आस्तित्व हीन कार्यों के लिये जाने और गूढ तथा खोजी कार्यों के लिये भी अपना कार्य करत है। जातक के अन्दर उस बुद्धि को प्रदान करता है जिससे जातक बेकार की कबाडा वस्तुओं और बेकार के व्यक्तियों का प्रयोग अधिक से अधिक धन कमाने और अस्पताली साधन इकट्ठे करने के लिये भी अपने अनुसार फ़ल देता है। शनि अगर धनु राशि का है तो जातक के लिये न्याय वाले क्षेत्रों में जाने से लम्बी यात्राओं मे जाने का धार्मिक यात्राओं में जाने का बदलाव भी देता है,पैतृक जायदाद के मामले और कानूनी रूप से चलने वाले झगडे भी इस समय में निपटने के साधन सामने आते है।

मकर राशि का शनि रहने वाले साधन और जीवन के प्रति किये जाने वाले कार्यों के लिये भी माना जाता है और गुरु के द्वारा गोचर से भ्रमण के समय यह किसी भी कार्य को या रहने वाले स्थान में परिवर्तन देता है। इस परिवर्तन का मूल उद्देश्य भी किसी कार्य को नये सिरे से करना और नये रूप में करने से भी माना जाता है। अक्सर मकर राशि का शनि मार्गी होने पर कठोर और मेहनत वाले कार्यों के अन्दर बदलाव देता है लेकिन वक्री शनि अपने अनुसार गुरु का साथ होने से बदलाव में दिमागी प्रगति को भी देता है।

कुम्भ राशि के शनि को अगर गुरु के द्वारा गोचर से अपना बल दिया जाता है तो जातक के लिये लगातार लाभ के साधनों के लिये बदलाव माना जाता है उसके जो भी मित्र या बडे भाई बहिने अपने अनुसार जातक को फ़ायदा देने के लिये सामने आते है उनके द्वारा बदलाव भी सही दिशा को देने के लिये किया जाता है। जातक को प्रापर्टी के मामले में भी अक्सर बदलाव करने का समय माना जाता है और इस राशि का असर अगर त्रिक भाव में होता है तो व्यक्ति इन्ही कारणों से परेशान भी होने का समय माना जाता है।

गुरु का मीन राशि में शनि के साथ गोचर होने से जातक की यात्रायें लम्बी होती है और वह अपने लिये दूसरी सम्पत्ति या बडे संस्थान के लिये किये जाने वाले कार्यों का समय भी माना जाता है इसके साथ ही जातक को बडी धार्मिक यात्रायें या संस्थान सम्भालने का कार्य भी मिलता है बाहरी लोग उसकी अप्रत्याशित सहायता करने के लिये भी बराबर सामने आने लगते है।

अन्य किसी भी जानकारी के लिये आप astrobhadauria@gmail.com पर लिख सकते है.

Friday, December 17, 2010

शुभ लाभ का शाब्दिक तंत्र

शुभ और लाभ शब्द हिन्दी मे अक्सर दुकानों और संस्थानो के मुख्य द्वार पर धन रखने वाले स्थानो पर यहां तक कि लोग अपनी अपनी तिजोरियों पर और आजकल लोग अपने अपने पूजा स्थानों में भी लिखने लग गये है,इन दोनो शब्दों का मतलब साधारण भाषा में शुभ से मेहनत करने के बाद अपनी मजदूरी के बराबर लाभ से मतलब फ़ायदा लेने से होता है। लेकिन जो लोग ठाठ से दो नम्बर के काम करते है वे भी अपने अपने स्थानों पर इन दोनो शब्दों को लिखे होते है। शुभ को कई कारणों में प्रस्तुत किया जाता है,जैसे शादी के कार्ड पर भी शुभ विवाह लिखा होता है,किसी अनुष्ठान के नाम के पहले भी शुभ लिखा होता है। लेकिन इस शब्द के लिये भूतडामर तंत्र में लिखा गया है कि ’श’अक्षर कर्म से सम्बन्धित है और कार्य के देवता शनि से सम्बन्धित है,इस अक्षर पर छोटे ’उ’ की मात्रा लगाने का मतलब होता है कर्म को कर्म के अनुसार किया जाना जो कर्म का सिद्धान्त है उसे अपनाते हुये कर्म करना,इसके बाद का जो शब्द ’भ’ का प्रयोग किया है वह भरण के लिये भी प्रयोग में आता है और भ चक्र के अनुसार ज्योतिषीय गणित का भी कारक होता है,यानी जो भी कार्य किया जाये वह दूसरों की भलाई के लिये समय कुसमय का ध्यान रखकर ही किया जाये। यह बात लाभ के लिये भी बताई गयी है,’ल’अक्षर का रूप लादने से प्रयोग में लाया जाता है,किसी वस्तु नाम को अगर अक्षर से जोडा जाये तो उसके अन्दर पहले प्राप्त करने की भावना होती है,अक्षर ’भ’ का सिद्धान्त पहले बता ही दिया है। जो लिया जाये वह भरपूर और प्राप्त करने वाले लाभ का भी प्रयोग उन्ही कार्यों के लिये किया जाये जो सर्व जन हिताय के लिये काम में आते हों।

Wednesday, December 15, 2010

धन कमाने का तंत्र

धन कमाने के लिये दो और कारकों की जरूरत पडती है,एक तो साधन और दूसरा साधनों को प्रयोग में लायी जाने वाली जानकारी। तीनों कारकों के इकट्ठा हुये बिना धन की बढोत्तरी नही हो सकती है। जैसे कम्पयूटर साधन है तो उसे चलाने की कला जानकारी मानी जायेगी,कम्पयूटर पर बनाये जाने वाले प्रोग्राम ही धन के रूप में माने जायेंगे। अक्सर मन में विचार आने लगते है कि बहुत मेहनत की और मेहनत करने के बाद भी धन नही आया,चित्त में खिन्नता बढ जाती है और जो भी कार्य आगे किया जाता है उसके अन्दर भी चित्त की खिन्नता दिक्कत देती है कार्य से मन दूर हो जाता है,और जब कार्य का मूल्यांकन किया जाता है तो घटिया कार्य की बजह से धन की प्राप्ति नही होती है। जब एक मुशीबत आती है तो दूसरी भी पीछे से अपना असर देने लगती है.घरबार और जीवन के चलाने के लिये रोजाना की जरूरते भी पूरी करनी पडती है,इन जरूरतों को पूरा करने के लिये लोगों से सहायता के रूप में या अपने फ़ायनेन्स से सहायता करने वाले के आगे हाथ फ़ैलाना पडता है जब उसका भी समय पर नही पहुंचता है तो वह भी दरवाजे पर अपनी वसूली वाली नियत से आने लगता है,चित्त की खिन्नता और कार्य की कमी के कारण वह मांगने वाला भी काल जैसा लगने लगता है और कई लोग मांगने वाले से पीछा छुडाने के लिये कई बहाने बनाने चालू कर देते है,उन बहानों को बनाने के बाद जो मांगने आया था उसे कोई संतुष्टि वाला जबाब नही मिलने के कारण वह भी अपने अपने अनुसार हावी होने की कोशिश करने लगता है। यह सब एक साथ होने के कारण या तो रहने वाले स्थान को छोडने का मन करता है या फ़िर किसी प्रकार की चालाकी आदि करने के बाद और धन को कहीं से प्राप्त करने के बाद चुकाने का जी करता है,इसी बात के लिये जो आजकल बैंक आदि में खाते खोले जाते है उनके द्वारा मिलने वाले चैक आदि का प्रयोग करने के बाद लोगों से धन लिया जाता है,और चैक के साथ बन्धक पत्र या सम्पत्ति को रख दिया जाता है,भारतीय जलवायु से भी समय पर चुकाने में दिक्कत आती है,जो कार्य गर्मियों में चला करते है वे सर्दी और बरसात के असर से बन्द हो जाते है और जो कार्य सर्दी में चला करते है वे गर्मी और बरसात में बन्द हो जाते है जो भी धन उधार लिया जाता है वह समय की चलती आवक के अनुसार ही लिया जाता है और जब समय पर धन नही चुकाया जाता है तो दोहरी मार एक तो ब्याज की और दूसरी वसूली करने वाले की बदसलूकी की दिमाग को परेशान करके रख देती है,बिना किसी कारण के चुकाने की तारीख दे दी जाती है और चुकाने का दिन आने से पहले ही दिमाग खराब होना शुरु हो जाता है,रात की नींद और दिन का चैन भी खराब हो जाता है,भूख प्यास सभी बन्द हो जाती है दिल डूब सा जाता है घर परिवार की चिन्ता तो दूर की बात अपनी ही चिन्ता नही रहती है। इन सब कारणों से धन की आवक में कमी तो होती ही है अपनी बनी बनायी साख और घर परिवार की इज्जत की चिन्ता भी दिक्कत देने वाली होती है जो लोग पहले से जानते होते है उनके डर से कि कभी उनके सामने अपना रुतबा दिखाया होता है वे भी रोजाना की बदलती हुयी जिन्दगी को देखकर दूर से ही कमेन्ट पास किया करते है,यह सब केवल जीवन को और नीचे ले जाने वाली बात ही मानी जाती है।

Sunday, October 31, 2010

रहस्य स्वप्न का

  • भाई साहब खाना खाने के लिये बैठे है सामने खाना है,लेकिन पता नही क्यों अचानक वे पीछे हटते है,और उनका चेहरा एक दम काला होता जा रहा है,उनके सीधी तरफ़ एक अंधेरा सा कमरा है और वे कह रहे है इस कमरे से निकल कर कोई सवार हो गया है,भाई साहब का मुंह सूखता चला जाता है,और उनकी जीभ भी बाहर की तरफ़ निकलती चली जाती है,मैं बहुत जोर लगाकर मोनू और मोनू की मम्मी को आवाज देता हूँ कि कोई जल्दी से पानी लाओ,कोई पानी लेकर नही आ रहा है,मैं दौड कर मकान के नीचे के हिस्से से पानी लेने के लिये भागता हूँ ,ध्यान से सीढियां चूक जाता हूँ और स्लिप होकर नीचे गिर पडता हूँ,मुझे कई लोगों की आवाज सुनाई देती है,लोग आकर मुझे उठा रहे है,और देखता हूँ कि किसी सफ़ेद बिस्तर पर पडा हूँ डाक्टर और नर्स काम कर रहे है,शायद अस्पताल ही है।
  • मुझे अचानक ध्यान आता है भाई साहब को पानी नही मिला है,मैं अस्पताल से भागता हूँ,रास्ते में बाजार मिलता है,मुझे मेरे पुराने मकान मालिक दिखाई देते है वे शर्बत की दुकान लगाकर बैठे है,उनके आगे कोई सब्जी बेच रहा है,उससे  मैं पालक नीबू और मिर्ची खरीदता हूँ,वह सभी सामान मेरे हाथ में ही दे देता है,मैं वहाँ से जल्दी से भागता हूँ केवल एक विचार दिमाग में चल रहा है,भाई साहब को प्यास लगी होगी,उनका हाल कैसा होगा।
  • यह ध्यान भी आता है कि उन्होने दो दिन से खाना नही खाया है,और जब वे खाना खाने बैठे तो न जाने उनके घर में कौन सी बाधा है जो उनके ऊपर सवार हो गयी है,अचानक मुझे एक रोटी की दुकान दिखाई दे रही है,उस पर एक औरत बैठी रोटी पका रही है,मैं उससे कहता हूँ कि वह मुझे चार रोटी देदे,इससे मै अपने भाई को खाना तो खिला दूँ,वह औरत मुझे रोटी नही देती है और कहती है यह चार रोटी का आटा ले जाओ और घर पर गर्म पकाकर दे देना। मैं उससे आटा लेकर और उसे दस रुपया देकर भागने लगता हूँ,देखता हूँ भाई साहब का मकान पहिचान में नही आ रहा है,मैं गली में भटकने लगता हूँ कोई बताने को तैयार नही है कि वे कहाँ रहते है।
  • मै किसी गलत गली में घुस जाता हूँ वहां पर पीले और लाल मिक्स कलर के मकान बने है और वहां पर काले काले आदमी घूम रहे है,वे पीछे की गली में जाने के लिये इशारा कर रहे है लेकिन वे क्या बोल रहे है,उनकी भाषा कुछ भी समझ में नही आ रही है,नाक में केवल चमेली की सुगंध आ रही है.
  • मैं उनकी बताई गली में जाता हूँ वहां भाई साहब का मकान दिखाई दे जाता है,और मैं सीधा मकान की सीढियां चढता हुआ छत पर ही चला जाता हूँ,वहां देखता हूँ भाई साहब छत की मुंडेर पर बैठे है,नीचे बहुत दूर लोग छोटे छोटे दिखाई दे रहे है,उनके बगल में मेरी स्वर्गीय छोटी भतीजी बैठी है,वह मुझे देखकर हँस रही है,मेरे हाथ में सामान देखकर कहती है,अंकल आज रोटी बनाकर आपको ही खिलानी पडेगी,मम्मी को तो फ़ुर्सत नही है,लेकिन क्या मजा होता कि चाची रोटी बनाती,छोटी चाची सब्जी बनाती,गुडिया परोसती,हम आप सब और दादा दादी मिलकर खाना खाते,भैया ने अपना घर हवाई जहाज के ऊपर बनाया है,दीदी ने अपना घर काले सफ़ेद रंग का बनाया है,दीदी के घर पर भी बहुत सारे प्लास्टिक के खिलौने है,लेकिन आपके घर पर जो खिलौने है वे बोलने वाले है,उनके खिलौने फ़ूलते पिचकते तो है लेकिन बोलते नही है.
  • मैं उसकी बातों को सुनता हूँ लेकिन मैं जैसे ही कुछ कहने के लिये प्रयास करता हूँ भाई साहब अपने मुंह में उंगली लगाकर इशारा करते है कि बोलना नही,इसे बोल लेने दो यह बहुत दिनो बाद बोली है,फ़िर वह कहती है कि पापा तुम्हारा चेहरा काला क्यों हो गया है,मैं उससे बताने के लिये फ़िर कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन फ़िर से भाई साहब इशारे से मुझे चुप करा देते है,वे एक तार की तरफ़ इशारा करते है वह तार हरे रंग का है और मुंडेर से नीचे की तरफ़ लटकता हुआ बहुत दूर तक चला गया है।
  • वह कहती जाती है,पता नही क्या क्या कहती है,लेकिन हर बात में कहती है,सब नन्नू की करामात है,मजे आ गये नन्नू की करतूत पर मै भाई साहब से पूंछने की कोशिश करता हूँ लेकिन वे फ़िर से मुझे चुप रहने का इशारा कर देते है.
  • एक व्यक्ति की आवाज जोर जोर से चिल्लाने की आ रही है,साथ में भाभी जी की भी आवाज आ रही है,वह कह रहा है कि मैं जनता को पानी पिलाता हूँ अपने बच्चों का पेट काटकर खर्च करता हूँ आप जो मुझसे इतने से काम के पैसे ले रही है वह आपके लिये भला नही करने वाले है यह पैसे आपकी जिन्दगी में कोहराम मचा देंगे,भाई साहब ध्यान से सुन रहे है लेकिन कुछ भी नही बोल रहे है,आवाजें धीमी होती जाती है,गाडियों का शोर सुनाई दे रहा है,लेकिन गाडी कोई दिखाई नही दे रही है।
  • अचानक मेरी भतीजी भाई साहब के गले की तरफ़ हाथ बढाती है और उन्हे धक्का देने के लिये खडी होती है,कहती जाती है दीदी के खिलौने की तरह आपको भी पिचका देती हूँ,इतने में ही भाई साहब का रूप अचानक बदल जाता है,वे मुझसे कहते है कि यह वही है जो मेरे ऊपर उस अन्धेरे कमरे से सवार हो गयी थी,अचानक मुझे भी ख्याल आता है कि यह भतीजी तो गुजर चुकी है,वह धीरे धीरे विलीन होती जाती है,और गायब हो जाती है,भाई साहब को मैं कहता हूँ कि यह सामान जो मैं लाया हूँ चलो आपको खाना बनाकर खिला देता हूँ,भाई साहब माथे पर हाथ लगाकर कहते है,क्या फ़ायदा है जो खाने वाला था वही चला गया अब मुझे खिलाने से क्या फ़ायदा,मैं उनके चेहरे की तरफ़ देखता हूँ,वे एक छोटे बच्चे की तस्वीर को हाथ में लेकर घूर रहे है,वह बच्चा मैं नही पहिचान रहा हूँ,मैने उनसे उस बच्चे की तरफ़ इशारा करते हुये कहा कि यह किसका है,वे उस फ़ोटो को जेब में रखते हुये कह रहे है इससे तुम्हे कोई मतलब नही रखना चाहिये,पिताजी की यह सब करतूत है,वे अगर मेरे साथ धोखा नही करते तो मेरी यह हालत नही होती,एन वक्त पर वे अपनी बात से मुकर गये थे,और मेरी जिन्दगी में तबाही आ गयी थी.
(यह स्वप्न दिनांक 20th April 2006 को देखा था,एक डायरी में लिख कर रख लिया था,आटा सब्जी रस की दुकान अस्पताल चेहरे का काला होना ऊंची मुंडेर पर बैठना काले काले लोगों का दिखाई देना भाषा को नही पहिचानना आदि बातें पितृ तर्पण की तरफ़ जाती है,इस तर्पण वाले काम को मैने दिनांक 27th September 2010 में चार साल बाद कर दिया)

चौसठ योगिनी और उनका जीवन में योगदान

स्त्री पुरुष की सहभागिनी है,पुरुष का जन्म सकारात्मकता के लिये और स्त्री का जन्म नकारात्मकता को प्रकट करने के लिये किया जाता है। स्त्री का रूप धरती के समान है और पुरुष का रूप उस धरती पर फ़सल पैदा करने वाले किसान के समान है। स्त्रियों की शक्ति को विश्लेषण करने के लिये चौसठ योगिनी की प्रकृति को समझना जरूरी है। पुरुष के बिना स्त्री अधूरी है और स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है। योगिनी की पूजा का कारण शक्ति की समस्त भावनाओं को मानसिक धारणा में समाहित करना और उनका विभिन्न अवसरों पर प्रकट करना और प्रयोग करना माना जाता है,बिना शक्ति को समझे और बिना शक्ति की उपासना किये यानी उसके प्रयोग को करने के बाद मिलने वाले फ़लों को बिना समझे शक्ति को केवल एक ही शक्ति समझना निराट दुर्बुद्धि ही मानी जायेगी,और यह काम उसी प्रकार से समझा जायेगा,जैसे एक ही विद्या का सभी कारणों में प्रयोग करना।
  1. दिव्ययोग की दिव्ययोगिनी :- योग शब्द से बनी योगिनी का मूल्य शक्ति के रूप में समय के लिये प्रतिपादित है,एक दिन और एक रात में 1440 मिनट होते है,और एक योग की योगिनी का समय 22.5 मिनट का होता है,सूर्योदय से 22.5 मिनट तक इस योग की योगिनी का रूप प्रकट होता है,यह जीवन में जन्म के समय,साल के शुरु के दिन में महिने शुरु के दिन में और दिन के शुरु में माना जाता है,इस योग की योगिनी का रूप दिव्य योग की दिव्य योगिनी के रूप में जाना जाता है,इस योगिनी के समय में जो भी समय उत्पन्न होता है वह समय सम्पूर्ण जीवन,वर्ष महिना और दिन के लिये प्रकट रूप से अपनी योग्यता को प्रकट करता है। उदयति मिहिरो विदलित तिमिरो नामक कथन के अनुसार इस योग में उत्पन्न व्यक्ति समय वस्तु नकारात्मकता को समाप्त करने के लिये योगकारक माने जाते है,इस योग में अगर किसी का जन्म होता है तो वह चाहे कितने ही गरीब परिवार में जन्म ले लेकिन अपनी योग्यता और इस योगिनी की शक्ति से अपने बाहुबल से गरीबी को अमीरी में पैदा कर देता है,इस योगिनी के समय काल के लिये कोई भी समय अकाट्य होता है।
  2. महायोग की महायोगिनी :- यह योगिनी रूपी शक्ति का रूप अपनी शक्ति से महानता के लिये माना जाता है,अगर कोई व्यक्ति इस महायोगिनी के सानिध्य में जन्म लेता है,और इस योग में जन्मी शक्ति का साथ लेकर चलता है तो वह अपने को महान बनाने के लिये उत्तम माना जाता है।
  3. सिद्ध योग की सिद्धयोगिनी:- इस योग में उत्पन्न वस्तु और व्यक्ति का साथ लेने से सिद्ध योगिनी नामक शक्ति का साथ हो जाता है,और कार्य शिक्षा और वस्तु या व्यक्ति के विश्लेषण करने के लिये उत्तम माना जाता है।
  4. महेश्वर की माहेश्वरी महाईश्वर के रूप में जन्म होता है विद्या और साधनाओं में स्थान मिलता है.
  5. पिशाच की पिशाचिनी बहता हुआ खून देखकर खुश होना और खून बहाने में रत रहना.
  6. डंक की डांकिनी बात में कार्य में व्यवहार में चुभने वाली स्थिति पैदा करना.
  7. कालधूम की कालरात्रि भ्रम की स्थिति में और अधिक भ्रम पैदा करना.
  8. निशाचर की निशाचरी रात के समय विचरण करने और कार्य करने की शक्ति देना छुपकर कार्य करना.
  9. कंकाल की कंकाली शरीर से उग्र रहना और हमेशा गुस्से से रहना,न खुद सही रहना और न रहने देना.
  10. रौद्र की रौद्री मारपीट और उत्पात करने की शक्ति समाहित करना अपने अहम को जिन्दा रखना.
  11. हुँकार की हुँकारिनी बात को अभिमान से पूर्ण रखना,अपनी उपस्थिति का आवाज से बोध करवाना.
  12. ऊर्ध्वकेश की ऊर्ध्वकेशिनी खडे बाल और चालाकी के काम करना.
  13. विरूपक्ष की विरूपक्षिनी आसपास के व्यवहार को बिगाडने में दक्ष होना.
  14. शुष्कांग की शुष्कांगिनी सूखे अंगों से युक्त मरियल जैसा रूप लेकर दया का पात्र बनना.
  15. नरभोजी की नरभोजिनी मनसा वाचा कर्मणा जिससे जुडना उसे सभी तरह चूसते रहना.
  16. फ़टकार की फ़टकारिणी बात बात में उत्तेजना में आना और आदेश देने में दुरुस्त होना.
  17. वीरभद्र की वीरभद्रिनी सहायता के कामों में आगे रहना और दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहना.
  18. धूम्राक्ष की धूम्राक्षिणी हमेशा अपनी औकात को छुपाना और जान पहिचान वालों के लिये मुशीबत बनना.
  19. कलह की कलहप्रिय सुबह से शाम तक किसी न किसी बात पर क्लेश करते रहना.
  20. रक्ताक्ष की रक्ताक्षिणी केवल खून खराबे पर विश्वास रखना.
  21. राक्षस की राक्षसी अमानवीय कार्यों को करते रहना और दया धर्म रीति नीति का भाव नही रखना.
  22. घोर की घोरणी गन्दे माहौल में रहना और दैनिक क्रियाओं से दूर रहना.
  23. विश्वरूप की विश्वरूपिणी अपनी पहिचान को अपनी कला कौशल से संसार में फ़ैलाते रहना.
  24. भयंकर की भयंकरी अपनी उपस्थिति को भयावह रूप में प्रस्तुत करना और डराने में कुशल होना.
  25. कामक्ष की कामाक्षी हमेशा संभोग की इच्छा रखना और मर्यादा का ख्याल नही रखना.
  26. उग्रचामुण्ड की उग्रचामुण्डी शांति में अशांति को फ़ैलाना और एक दूसरे को लडाकर दूर से मजे लेना.
  27. भीषण की भीषणी. किसी भी भयानक कार्य को करने लग जाना और बहादुरी का परिचय देना.
  28. त्रिपुरान्तक की त्रिपुरान्तकी भूत प्रेत वाली विद्याओं में निपुण होना और इन्ही कारको में व्यस्त रहना.
  29. वीरकुमार की वीरकुमारी निडर होकर अपने कार्यों को करना मान मर्यादा के लिये जीवन जीना.
  30. चण्ड की चण्डी चालाकी से अपने कार्य करना और स्वार्थ की पूर्ति के लिये कोई भी बुरा कर जाना.
  31. वाराह की वाराही पूरे परिवार के सभी कार्यों को करना संसार हित में जीवन बिताना.
  32. मुण्ड की मुण्डधारिणी जनशक्ति पर विश्वास रखना और संतान पैदा करने में अग्रणी रहना.
  33. भैरव की भैरवी तामसी भोजन में अपने मन को लगाना और सहायता करने के लिये तत्पर रहना.
  34. हस्त की हस्तिनी हमेशा भारी कार्य करना और शरीर को पनपाते रहना.
  35. क्रोध की क्रोधदुर्मुख्ययी क्रोध करने में आगे रहना लेकिन किसी का बुरा नही करना.
  36. प्रेतवाहन की प्रेतवाहिनी जन्म से लेकर बुराइयों को लेकर चलना और पीछे से कुछ नही कहना.
  37. खटवांग खटवांगदीर्घलम्बोष्ठयी जन्म से ही विकृत रूप में जन्म लेना और संतान को इसी प्रकार से जन्म देना.
  38. मलित की मालती
  39. मन्त्रयोगी की मन्त्रयोगिनी
  40. अस्थि की अस्थिरूपिणी
  41. चक्र की चक्रिणी
  42. ग्राह की ग्राहिणी
  43. भुवनेश्वर की भुवनेश्वरी
  44. कण्टक की कण्टिकिनी
  45. कारक की कारकी
  46. शुभ्र की शुभ्रणी
  47. कर्म की क्रिया
  48. दूत की दूती
  49. कराल की कराली
  50. शंख की शंखिनी
  51. पद्म की पद्मिनी
  52. क्षीर की क्षीरिणी
  53. असन्ध असिन्धनी
  54. प्रहर की प्रहारिणी
  55. लक्ष की लक्ष्मी
  56. काम की कामिनी
  57. लोल की लोलिनी
  58. काक की काकद्रिष्टि
  59. अधोमुख की अधोमुखी
  60. धूर्जट की धूर्जटी
  61. मलिन की मालिनी
  62. घोर की घोरिणी
  63. कपाल की कपाली
  64. विष की विषभोजिनी

दीपावली पूजा में दस दिक्पाल

दीपावली की पूजा में दस दिक्पालों की पूजा बहुत ही जरूरी मानी जाती है। जैसे बिना खेत की बाड के खेत की फ़सल को सुरक्षित नही रखा जा सकता है वैसे ही बिना दिक्पाल की पूजा के व्यवसाय घर और शरीर की सुरक्षा भी नही की जा सकती है। जो लोग सीधे से दीपावली पूजन के बाद लक्ष्मी को प्राप्त करने की धारणा करते है उनका हाल बाद में वही होता है कि उगी हुयी फ़सल को बिना किसी रखवाले के कोई भी बरबाद कर जाये। दस दिक्पालों का अर्थ होता है दसों दिशाओं के देवताओं की पूजा। वैसे चार दिशायें मुख्य रूप से मानी जाती है,पूर्व दक्षिण पश्चिम और उत्तर,लेकिन इन चार के बीच के कोणों के नाम भी माने जाते है यथा ईशान आग्नि नैऋत्य और वायव्य जैसे अपने चारों तरफ़ आठ दिशायें है उसी प्रकार से ऊपर और नीचे को भी दिशाओं के लिये मान्यता दी गयी है। दीपावली पूजन करने से पहले दशों दिक्पालों की पूजा करना अनिवार्य माना जाता है,इस भेद को शायद ही कहीं प्रकट किया गया है ।

पूजा स्थान में साफ़ सफ़ाई और मनपसंद रंग रोगन करने के बाद सभी प्रयोग में ली जाने वाली वस्तुओं को यथा स्थान रखने के बाद तथा नकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाले कारकों कचडा और बेकार की टूटी फ़ूटी वस्तुओं को निवास या व्यवसाय स्थान से दूर करने के बाद दस दिक्पाल की स्थापना की जाती है,विधि और नियम शास्त्रानुसार इस प्रकार से है:-

पूर्व में इन्द्र का आवाहन और स्थापन
पूर्व दिशा में स्थान को शुद्ध करने के बाद पीले चावल हाथ किसी दोने या किसी साफ़ बर्तम में रखकर केवल स्थान में छिडकते है और चावल को छिडकते समय यह मन्त्र उच्चारित करते है:-
ऊँ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रँ हवे हवे सुहँ शूरमिन्द्रम। ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रँ स्वस्ति नो मधवा धात्विन्द्र:॥
इन्द्रम सुरपतिश्रेष्ठं वज्रहस्तं महाबलम,आवाहवे यज्ञसिद्धयै शतयज्ञाधिपं प्रभुम॥
ऊँ भूभुर्व: स्व: इन्द्र ! इहागच्छ,इह तिष्ठ इन्द्राय नम: स्वाहा,इन्द्रमावाहयामि,स्थापयामि॥
इस मन्त्र से मानसिक रूप से पूर्व दिशा में इन्द्र का स्थापन किया जाता है,और इन्द्र के नाम से ही इन्द्र की शक्तियों का आभास होना स्वाभाविक है।
अग्नि दिशा में अग्नि का आवाहन और स्थापन
पूर्व और दक्षिण के बीच में जो स्थान होता है वह अग्नि की दिशा मानी जाती है। अग्नि का स्थान इसी दिशा में माना जाता है इसलिये ही घरों के अन्दर रसोई का और व्यापारिक स्थान में बिजली आदि की स्थापना इसी स्थान में की जाती है,इस स्थान में अग्नि के स्थापन के बाद ऊर्जा से सम्बन्धित कारक सुलभता से मिलते रहते है और शक्ति की कमी नही रहती है। सिन्दूर में चावलों को रंग कर इस स्थान में चावलो को इस मंत्र के पढते हुये छिडकना चाहिये:-
ऊँ अग्निं दूतं पुरो धधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँ देवाँ आ साद्यादिह॥ त्रिपादं सप्तहस्तं च द्विमूर्धानं द्विनासिकाम। षण्नेत्रम च चतु:श्रोत्रमग्निमावाहयाम्यहम॥
ऊँ भूर्भुव: स्व: अग्ने ! इहागच्छ इह तिष्ठ अग्नये नम:,अग्निमावाहयामि,स्थापयामि॥
.दक्षिण दिशा में यम का आवाहन और स्थापना
ऊँ यमाय त्वाऽगिंरस्वते पितृमते स्वाहा ! स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्म: पित्रे॥
महामहिषमारूढं दण्डहस्तं महाबलम। यज्ञसंरक्षणार्थाय यममावाहयाम्यहम॥
ऊँ भूर्भुव: स्व: यम ! इहागच्छ,इह तिष्ठ यमाय नम:,यममावाहयामि,स्थापयामि॥
नैऋत्य दिशा में निऋति का आवाहन और स्थापन
ऊँ असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य। अन्यमस्मदिच्छ सा त इत्या नमो देवि निऋते तुभ्यमस्तु॥
सर्व प्रेताधिपं देवं निऋतिं नील विग्रहम। आवाहये यज्ञसिद्धयै नरारूढं वरप्रदम॥
ऊँ भूर्भुव: स्व: निऋते ! इहागच्छ इह तिष्ठ निऋते नम:,निऋतिमावाहयामि,स्थापयामि॥
पश्चिम दिशा में वरुण का आवाहन और स्थापन
ऊँ तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशँ स मा न आयु: प्रमोषी:॥
शुद्ध स्फ़टिक संकाशं जलेशं यादसां पतिम। आवाहये प्रतीचीशं वरुणं सर्वकामदम॥
ऊँ भूभुर्व: स्व: वरुण ! इहागच्छ,इह तिष्ठ वरुणाय नम:,वरुणामावाहयामि स्थापयामि॥
वायव्य दिशा में वायु का आवाहन और स्थापन
ऊँ आ नो नियुद्भि: शतनीभिरध्वरँ सहस्त्रिणीभिरूप याहि यज्ञम। वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तभि: सदा न:॥
मनोजवं महातेजं सर्वतश्चारिणं शुभम। यज्ञसंरक्षणार्थाय वायुमावाहयाम्यहम॥
ऊँ भूभुर्व: स्व: वायो ! इहागच्छ,इह तिष्ठ वायवे नम:,वायुमावाहयामि,स्थापयामि॥
उत्तर दिशा में कुबेर का आवाहन और स्थापन
ऊँ कुविदंग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय। इहेहैषां कृणुहि भोजनानिये बर्हिषो नम उक्तिं यजन्ति॥
उपयामगृहीतोऽस्यशिवभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण॥
एष ते योन्स्तेजसे त्वा वीर्याय त्वा बलाय त्वा॥
आवाहयामि देवेशं धनदं यक्ष पूजितम। महाबलं दिव्यदेहं नरयानगतिं विभुम॥
ऊँ भूभुर्व: स्व: कुबेर ! इहागच्छ,इह तिष्ठ कुबेराय नम:,कुबेरमावाहयामि,स्थापयामि॥
ईशान दिशा में ईशान का आवाहन और स्थापन
ऊँ तमीशानं जगत स्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम।पूषा नो यथा वेदसामदद वृधे रक्षिता पायुरदब्ध: स्वस्तये॥
सर्वाधिपं महादेवं भूतानां पतिमव्ययम। आवाहये तमीशानं लोकानामभयप्रदम॥
ऊँ भूभुर्व: स्व: ईशान ! इहागच्छ,इह तिष्ठ,ईशानाय नम:,ईशानमावाहयामि,स्थापयामि॥
ऊर्ध्व दिशा (ईशान और पूर्व के मध्य) में ब्रह्मा का आवाहन और स्थापन
ऊँ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुर्तस्ताद्भि: सीमत: सुरुचो वेन आव:। स बुन्ध्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च वि व:॥
पद्मयोनिं चतुर्मूर्तिं वेदगर्भं पितामहम। आवाहयामि ब्रह्माणं यज्ञ संसिद्धिहेतवे॥
ऊँ भूर्भुव: स्व: ब्रह्मन ! इहागच्छ,इहतिष्ठ ब्रह्मणे नम:,ब्रह्माणमावाहयामि,स्थापयामि।
अघदिशा (नैऋत्य पश्चिम के मध्य) अनन्त का आवाहन और स्थापन
ऊँ स्योना पृथवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा न: शर्म सप्रथा:।
अनन्तं सर्वनागानामधिपं विश्वरूपिणम। जगतां शान्तिकर्तारं मण्डले स्थापयाम्यहम॥
ऊँ भूर्भुव: स्व: अनन्त ! इहागच्छ,इह तिष्ठ अनन्ताय नम:,अनन्तमावाहयामि स्थापयामि॥

इस प्रकार से दक्षिण दिशा के अलावा अन्य सभी स्थानों पर पीले चावलों को छिडकते हुये उपरोक्त मंत्रो का उच्चारण करते हुये मानसिक रूप से सभी दिकपालों को स्थापित करने के बाद व्यवसाय या घर में अन्य पूजा पाठ को शुरु करना ठीक रहता है। इसके बाद जो भी कार्य किया जाता है,उपरोक्त दिक्पाल अपनी अपनी अद्रश्य शक्ति से व्यवसाय और घर के कारकों को भलीभांति सुरक्षा करने के लिये अपना बल प्रदान करते रहते है।
इस पूजा के बाद -"ऊँ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नम: स्वाहा" मंत्र का जाप दशों दिशाओं में फ़िर से करे,जिससे इनकी स्थापना हमेशा के लिये बनी रहे,मानसिक रूप से इन दिक्पालों से प्रीति के लिये "अनया पूजया इन्द्रादिदशदिक्पाला: प्रीयन्ताम,न मम" मंत्र का जाप करना चाहिये,जिससे किसी भी दिक्पाल के कमजोर होने से अन्य दिक्पाल आपके व्यवसाय और घर की सुरक्षा करते रहें,और समय समय पर विभिन्न कारणों से आपको विभिन्न तरीकों से बताते रहें।

Wednesday, October 27, 2010

चौथा राहु

माता मन मकान की बाते सभी करते है और माता मन मकान से सभी का लगाव होता है। बचपन से जवानी तक माता से और जवानी से लेकर बुढापे तक मकान से तथा बुढापे से लेकर मौत आने तक मन के साथ जुडा रहना जरूरी होता है। यह बात सही है कि आदमी कहीं पर स्वतंत्र नही है लेकिन मन के साथ तो वह हमेशा ही बन्धा हुआ है,मन का स्थान कुंडली मे चौथे भाव मे होता है और चौथे भाव से मन शंकाओं से तब भर जाता है जब उसके साथ राहु का भी सम्बन्ध स्थापित हो जाये। संसार में कई लोग आपको तर्क और कुतर्क करते हुये मिल जायेंगे। जैसे चौथे भाव के राहु वाले व्यक्ति से कोई बात की जाये तो उसके अन्दर हजारों शंकाये एक बात के लिये पैदा हो जायेंगी वह उन बातों के लिये तरह तरह की जानकारिया और उन जानकारियों के पीछे और कई जानकारियां लेने की कोशिश करेगा,समझाना भारी केवल चौथे राहु वाले के लिये ही पडता है यह बहुत ही समझने वाली बात है। ज्योतिष के अनुसार राहु को रूह का दर्जा दिया गया है,राहु केवल रूह के रूप में शरीर पर हावी होता है लोग इसकी गणना कई तरह की छाया रूपी शक्ति के लिये किया करते है। गुरु के साथ राहु का साथ होना भी खतरनाक माना जाता है गुरु जीव होता है तो राहु रूह जीव के ऊपर रूह हावी हो जाये तो जीव की स्वतंत्र सत्ता रह ही नही पाती है जैसा रूह चाहती है जीव उसी प्रकार से कार्य करता है। अगर राहु के साथ मंगल स्थापित हो जाता है जीव के अन्दर नीची सोच के साथ खून की चाल धीमी हो जाती है वह जरा सी बात को सोचने लगता है और अपने ही अन्दर घूमने लगता है। अक्सर चौथा राहु स्त्री की कुंडली में बहुत बुरा प्रभाव डाला करता है। किसी महिला के दिमाग में उसके परिवार के प्रति अगर राहु नाम की रूह कोई भ्रम डाल दे और वह उस भ्रम को निकालने के लिये अपने सारे प्रयास शुरु कर देगी,और जब तक उसका जीवन है वह उसी भ्रम के अन्दर फ़ंसी रहेगी,हर रहने वाले स्थान को वह शक की नजर से देखेगी,और जो भी उसके परिवारी जन है उनके लिये उसके मन में शक की बीमारी ही रहेगी,उसके लिये कितना ही जतन किया जाये कि उसे सत्यता का पता मिल जाये लेकिन वह सत्य के अन्दर से भी असत्यता का आभास करवाने लगेगी। एक पति के लिये इससे खतरनाक बात क्या हो सकती है कि उसके सही रहने के बाद भी उसकी पत्नी उसे शाम को प्रताणित केवल इसलिये करे कि वह देर से घर आया तो जरूर उसके अन्दर कोई न कोई राज है,या गाडी रास्ते में खराब हुयी तो उसके अन्दर भी उसकी कोई चाल है,या वह खाना कम खा रहा है या वह किसी के साथ जा रहा है या कोई महिला उससे बात करने लगी है आदि बातें यह रूह बहुत बुरी तरह से प्रकट करती है। कई लोगों को देखा है कि वे अपने इसी ख्याल के कारण घंटो बाथरूम में पानी बहाया करती है कि उनका वस्त्र गंदा है उनके ब्रस को किसी ने छू लिया होगा,उनके नहाने वाले साबुन को किसी ने प्रयोग में लिया होगा या किसी ने उसकी चप्पलों को ही प्रयोग में लिया होगा। चौथा राहु सदैव कर्जा दुश्मनी और बीमारी के भाव को देखता है और जो भी बाते इन कारकों से जुडती है,वे सभी चौथे राहु के लिये मशाला बन जाती है,किसी से दुश्मनी बन जाने पर चौथा राहु वाला व्यक्ति दुश्मनी से कम अपने शक वाले ख्यालों से जल्दी मरने की कोशिश करेगा,जैसे वह रात को सो रहा है और चूहा आकर किसी प्रकार से कोई सामान को बजा दे तो वह यह नही सोचेगा कि चूहे ने उसके सामान को गिराया है वह पूरे घर के अन्दर कोहराम इसलिये मचा देगा कि कोई उसके घर में था और वह उसे मारने आया था। कारण चौथा भाव अपनी युति से अष्टम मौत के भाव को भी देखता है। इसके अलावा बाहरी आफ़तों के लिये इस भाव को भी अधिक माना जाता है किसी धर्म स्थान या किसी अस्पताली कारण को अगर वह व्यक्ति समझ गया है तो वह अपने मरीजों केवल शक के आधार पर ही दवाइयां देगा और मरीज जीने वाला भी होगा तो भी शक के आधार पर दी जाने वाली दवाइयों से वह समय से पहले ही परलोक सिधार जायेगा। अक्सर चौथे राहु वाले व्यक्ति की पहिचान यात्रा में सही रूप से की जा सकती है,इस प्रकार का व्यक्ति जब भी यात्रा करेगा अपने स्थान के अलावा भी अपने सामान को फ़ैलाने का काम करेगा,उसकी कोई वस्तु जरा सी इधर उधर हुयी और वह अपने शक वाले स्वभाव को आसपास वाले यात्रियों पर करना शुरु कर देगा,इसके अलावा वह रास्ते भर किसी से बात नही करेगा,अपने ही ख्यालों में खोया हुआ यात्रा करेगा,जहां उसे उतरना है उसके साथ वाले सहयात्री उसे उतारने की कोशिश करेंगे तो ही वह उतरेगा अन्यथा उसे ध्यान नही होगा कि उसे उतरना भी है या नही। चौथे राहु वाला व्यक्ति प्रेम करने के मामले भी शक करने वाला माना जाता है,किसी ज्योतिष जानने वाले के पास वह शादी के पहले ही जाना शुरु कर देगा और शादी से पहले ही वह पूरी जानकारी अपने पति या पत्नी के लिये करना शुरु कर देगा,यह भी देखा गया है कि इन्ही कारणों से अधिकतर इस प्रकार के लोगों की शादी या तो हो नही पाती है और हो भी जाती है तो वह वैवाहिक जीवन को सही नही चला पाते है,उनको अधिक सोचने के कारण टीबी या सांस वाले रोग पैदा हो जाते है और अस्पताल की तरह से घर का माहौल भी बन जाता है। दमा स्वांस आदि की बीमारी होने के बाद वे अधिकतर मामले में सांस की गति को सामान्य रखने के इन्हेलर आदि का प्रयोग करते हुये देखे जाते है। महिलाओं में चौथे राहु का असर एक प्रकार से और देखा जा सकता है कि वे अपने घर के फ़र्स को साफ़ से साफ़ रखना चाहती है उन्हे गंदगी बहुत जल्दी दिखाई देने लगती है,कोई जरा सा घर के अन्दर घुसा और उसके पैरों के निशान बने तो वह जल्दी से ही पौंछा लेकर उस स्थान को पोंछने का कार्य करने लगेगी,उन्हे घर के माहौल में एक अजीब सी बदबू का होना मिलेगा और वे अधिक समय घर की साफ़ सफ़ाई में ही बिताना पसंद करती है।

Tuesday, October 26, 2010

वक्र चन्द्रमहि ग्रसहि न राहू

भले का जमाना है ही नही जो टेढा है उसे सभी मानते है,अगर आपको विश्वास नही है तो जरा दूज के चन्द्रमा को ही देख लो,पूनम के चांद को सभी देखते है और रात में रोशनी देने के बाद भी उसे कोई नही मानता है। कभी कभी सत्यनारायण की कथा दिन में कर ली जाती है लेकिन रात में कोई चन्द्रमा को निहारने नही बैठता है। ईद का चन्द्रमा भी शायद दूज के चन्द्रमा को ही कहते है,मुस्लिम भाई भी इस चांद को देखने के चक्कर में पूरी दुनिया में तहलका मचा देते है,कि चांद दिखाई दे गया है ईद की छुट्टी मजे आजाते है। किया भी क्या जा सकता है,नया चन्द्रमा होता है और नयी बहू का पालागन सभी करते है। उसे देखने के लिये मोहल्ले पडौस के सभी आजाते है कोई नजराना देता है कोई बहू को जेवर और कपडे भी देता है लेकिन दो महिने बाद वही बहू जब अपने चांद जैसे मुखडे को खोलकर अपनी चाल में आजाती है तो सभी बातें बनाने लगते है,कि वह तो ऐसे चल रही थी वह तो वैसे चल रही थी। समय का तकाजा है,पूनम के चन्द्रमा को मात इसलिये मिली है कि वह आखिरी पडाव पर होता है दूसरे दिन से उसके अन्दर घटने वाली स्थिति आजाती है,लेकिन दूज के चन्द्रमा में बढने वाली स्थिति होती है इसलिये उसे लोग इज्जत से देखते है,आसमानी राहु की छाती को चीर कर बाहर निकलता दिखाई देता है उसका दिखाई देना इसलिये और सबको मजेदार लगता है जैसे निशा रानी के सीने में किसी ने चमकदार खंजर घुसेड दी हो,और निशारानी अपनी बेहोशी में पडी दिखाई देती हो। ज्योतिष के हिसाब से भी देखा तो पूनम की तो कन्या राशि आती है,उसका जीवन तो सेवा करने में ही जायेगा,लेकिन दूज की मीन राशि आती है वह अपने आप कल का जीवन अपनी गति से देखेगी। कन्या का स्वभाव सेवा वाले कामों में माना जाता है,घटता हुआ करेगा भी क्या,जब उसके पास से धीरे धीरे खर्च होगा तो वह कर्जा लेने के लिये अपनी गति को आगे करने की योजना तो बनायेगा ही,जिसने उससे पहले ले लिया है और देने का मूड अगर नही बना पा रहा है तो वह दुश्मनी तो बनायेगा ही,और अगर कोई रास्ता लेने का नही बन रहा है तो सोच सोच कर बीमार तो होना ही है,यह होता पूनम रानी के साथ,लेकिन दूज का काम ही निराला है,कुछ समय के लिये दीदार दिये और चल दिये,सारी रात तो हाजिरी बजानी नही है,केवल घंटे भर के लिये आना है और दीदार कराने के बाद अपने स्थान पर वापस आना है,जिसे गर्ज हो वह चाहे दूज के रूप में देख ले और गणेश जी की छवि को माने जिसे जरूरत हो वह ईद की तरह से देख ले और अपने नये महिने की शुरुआत कर ले,जिसकी जरूरत हो वह क्रूर कर्म करने के रूप में देख ले और अपने कर्म करना शुरु कर दे,जो होना था वह एक घंटे के अन्दर ही हो जाता है। वैसे ही मीन राशि का स्थान आराम करने वाले स्थान पर होता है,भाग्य के घर में उसका स्थान माना जाता है,किसी की भी कुंडली को देख लो भाग्य और धर्म का घर भी मीन राशि ही होती है,मित्रों के पैसे से मजे करने है तो मीन राशि में जन्म लेना हितकर होता है,जरा सा काम किया और मित्रों के वफ़ादार बन गये,बाकी की राशियां तो अपने आप आगे पीछे चलने लगती है,पूनम से दूज की दुश्मनी होती है,पूनम को रातभर जगना पडता है,और दूज को एक घंटे में आकर अपने बल को दिखाकर चला जाना होता है।

Friday, September 17, 2010

कुंडली से फ़लादेश करने का तरीका

भारतीय ज्योतिष में जो फ़लादेश किया जाता है उसके लिये कई तरह के तरीके अपने अपने अनुसार अपनाये जाते है,लेकिन मै जो तरीका प्रयोग में लाता हूँ वह अपने प्रकार का है.
राशि चक्र में गुरु जहाँ हो उसे लगन मानना जरूरी है
कुंडली का विश्लेषण करते वक्त गुरु जहाँ भी विराजमान हो उसे लगन मानना ठीक रहता है,कारण गुरु ही जीव का कारक है और गुरु का स्थान ही बता देता है कि व्यक्ति की औकात क्या है,इसके साथ ही गुरु की डिग्री भी देखनी जरूरी है,गुरु अगर कम या बहुत ही अधिक डिग्री का है तो उसका फ़ल अलग अलग प्रकार से होगा,उदाहरण के लिये कन्या लगन की कुण्डली है और गुर मीन राशि में सप्तम में विराजमान है तो फ़लादेश करते वक्त गुरु की मीन राशि को लगन मानकर गुरु को लगन में स्थापित कर लेंगे,और फ़लादेश गुरु की चाल के अनुसार करने लगेंगे।
ग्रहों की दिशाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है
कालचक्र के अनुसार राशियों के अनुसार दिशायें भी बताई जाती है,जैसे मेष सिंह और धनु को पूर्व दिशा की कारक और मिथुन तुला तथा कुम्भ को पश्चिम दिशा की कारक वृष कन्या और मकर को दक्षिण दिशा की कारक तथा कर्क वृश्चिक और मीन को उत्तर दिशा की कारक राशियों में माना जाता है। इन राशियों में स्थापित ग्रहों के बल और उनके द्वारा दिये गये प्रभाव को अधिक ध्यान में रखना पडेगा।
ग्रहों की द्रिष्टि का ध्यान रखना जरूरी है
ग्रह अपने से सप्तम स्थान को देखता है,यह सभी शास्त्रों में प्रचिलित है,साथ ग्रह अपने से चौथे भाव को अपनी द्रिष्टि से शासित रखता है और ग्रह अपने से दसवें भाव के लिये कार्य करता है,लेकिन सप्तम के भाव और ग्रह से ग्रह का जूझना जीवन भर होता है,इसके साथ ही शनि और राहु केतु के लिये बहुत जरूरी है कि वह अपने अनुसार वक्री में दिमागी बल और मार्गी में शरीर बल का प्रयोग जरूर करवायेंगे,लेकिन जन्म का वक्री गोचर में वक्री होने पर तकलीफ़ देने वाला ग्रह माना जायेगा.
ग्रहों का कारकत्व भी समझना जरूरी है
ग्रह की परिभाषा के अनुसार तथा उसके भाव के अनुसार उसका रूप समझना बहुत जरूरी होता है,जैसे शनि वक्री होकर अगर अष्टम में अपना स्थान लेगा तो वह बजाय बुद्धू के बहुत ही चालाक हो जायेगा,और गुरु जो भाग्य का कारक है वह अगर भाग्य भाव में जाकर बक्री हो जायेगा तो वह जल्दबाजी के कारण सभी तरह के भाग्य को समाप्त कर देगा और आगे की पुत्र संतान को भी नही देगा जिससे आने वाले वंश की क्षति का कारक भी माना जायेगा.
जन्म के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनायें होती है
जन्म के समय के ग्रह और गोचर के ग्रहों का आपसी तालमेल ही वर्तमान की घटनाओं को बताने के लिये माना जाता है,अगर शनि जन्म से लगन में है और गोचर से शनि कर्म भाव में आता है तो खुद के कर्मों से ही कार्यों को अन्धेरे में और ठंडे बस्ते मे लेकर चला जायेगा। इसके बाद लगन का राहु गोचर से गुरु को अष्टम में देखता है तो जीवन को बर्फ़ में लगाने के लिये मुख्य माना जायेगा,जीव का किसी न किसी प्रकार की धुंआ तो निकलना ही है।
गुरु के आगे और पीछे के ग्रह भी अपना अपना असर देते है
गुरु के पीछे के ग्रह गुरु को बल देते है और आगे के ग्रहों को गुरु बल देता है,जैसी सहायता गुरु को पीछे से मिलती है वैसी ही सहायता गुरु आगे के ग्रहो को देना शुरु कर देता है,यही हाल गोचर से भी देखा जाता है,गुरु के पीछे अगर मंगल और गुरु के आगे बुध है तो गुरु मंगल से पराक्रम लेकर बुध को देना शुरु कर देगा,अगर मंगल धर्म मय है तो बुध को धर्म की परिभाषा देना शुरु कर देगा और और अगर मंगल बद है तो गाली की भाषा देना शुरु कर देगा,गुरु के पीछे शनि है तो जातक को घर में नही रहने देगा और गुरु के आगे शनि है तो गुरु घर बाहर निकलने में ही डरेगा। गुरु के आगे शनि जातक को जीवन जीने के लिये पहाड सा लगेगा और गुरु के पीछे शनि वाला जातक जीवन को समझ ही नही पायेगा कि जीवन कब शुरु हुआ और कब खत्म होने के लिये आगया। गुरु के आगे चन्द्रमा होता है तो जातक को माता के साथ पब्लिक भी साथ देती है,और गुरु के पीछे चन्द्रमा होता है तो जातक को माता और पब्लिक ही आगे बढने के लिये कहती है तथा वह अपने कामो के कारण माता से दूर और यात्रा तथा खर्चों से ही परेशान होता है। गुरु से पीछे का सूर्य जातक को पिता और राज्य से सहारा देने वाला माना जाता है,लेकिन गुरु से आगे का  सूर्य पिता और सरकारी कामों के लिये तथा भविष्य के पुत्र के पीछे पीछे दौडाने वाला माना जाता है। गुरु से बारहवां बुध जमीन होने के बाद भी उल्टे दिमाग के कारण कुछ भी करने से दूर रहता है और गुरु से आगे बुध होने पर बातों से काम चलाने वाला और बातों से ही पेट भरने वाला होता है।

Wednesday, September 1, 2010

श्रीकृष्ण अष्टाक्षर महिमा


किं मंत्रैर्बहुभिर्विन्श्वर्फ़लैरायाससाधयैर्मखै:,
किंचिल्लेपविधानमात्रविफ़लै: संसारदु:खावहै।
एक: सन्तपि सर्वमंत्रफ़लदो लोपादिदोषोंझित:,
श्रीकृष्ण: शरणं ममेति परमो मन्त्रोऽयमष्टाक्षर॥

श्रीमन्यमहाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्यचरण ने अपने आश्रितजनों के कल्याण के लिये अष्टाक्षर महामंत्र की दीक्षा देकर सदैव उसका जप करने के लिये आज्ञा की है। श्रीमत्प्रभुचरण श्रीगुसांई जी से प्रारम्भ कर अब तक हमारे आचार्य वंशज इस महामंत्र इस महामंत्र की दीक्षा शरणागत दैवी जीवों को देने की कृपा कर रहे है। सम्प्रदाय का प्रधान मंत्र यह अष्टाक्षरी महामंत्र है। श्रीमहाप्रभु जी द्वारा प्राप्त इस अष्टाक्षर मंत्र की वैष्णव दीक्षा लेते है,तथा इस मंत्र का नित्यप्रति जाप भी करते है। अष्टाक्षर महामंत्र की महिमा श्रीबल्लभ सम्प्रदाय में सुप्रसिद्ध है। श्रीमत्प्रभुचरण श्री बिट्ठलनाथ गुसांई जी ने अपने अष्टाक्षरार्थ निरूपण नामक ग्रंथ में यह स्पष्ट किया है। श्रीगुसांई जी आज्ञा करते हैं कि :-

श्रीकृष्ण: कृष्ण कृष्णेति कृष्ण नाम सदा जपेत।
आनन्द: परमानन्दौ बैकुंठम तस्य निश्चितम॥

जो प्राणी सदा श्रीकृष्ण भगवान के नाम का स्मरण करता है,उसको इस लोक में आनन्द तथा परमानन्द की प्राप्ति होती है। और अवश्य बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। अष्टाक्षर में आठ अक्षर है,उनका फ़ल श्रीगुसांई जी ने इस प्रकार लिखा है:-

  1. श्री सौभाग्य देता है,धनवान और राजवल्लभ करता है.
  2. कृ यह सब प्रकार के पापों का शोषण करता है,जड से किसी भी कर्म को समाप्त करने की हिम्मत देता है.यह पैदा भी करता है और पैदा करने के बाद समाप्त भी करता है,जैसे कृषक अनाज की फ़सल को पैदा भी करता है और वही काट कर लोक पालना के लिये देता है.
  3. ष्ण आधि भौतिक आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीन प्रकार के दु:खों को हरण करने वाला है.
  4. श जन्म मरण का दुख दूर करता है.
  5. र प्रभु सम्बन्धी ज्ञान देता है
  6. णं प्रभु में द्रढ भक्ति को उत्पन्न करता है.
  7. म भगवत्सेवा के उपदेशक अपने गुरु देव से प्रीत कराता है.
  8. म प्रभु में सायुज्य कराता है,यानी लीन कराता है जिससे पुन: जन्म नही लेना पडे और आवागमन से मुक्ति हो.
श्रीमहाप्रभु जी अपने नवरत्न ग्रंथ में आज्ञा करते है कि :-

तस्मात्सर्वात्मना नित्य: श्रीकृष्ण: शरणं मम।
वददिभरेव सततं स्थेयमित्येव मे मति:॥

सब प्रकार की चिन्ताओं से बचने के लिये सदैव सर्वात्मभाव सहित "श्रीकृष्ण: शरणं मम" कहते रहना अथवा सदैव अष्टाक्षर जप करने वाले भगवदीयों की संगति में रहना यह मेरी सम्मति है। संक्षेप में अष्टाक्षर मंत्र के जप से सब कार्य सिद्ध होते है। आधि भौतिक आध्यात्मिक आधिदैविक इन विविध दुखों में से किसी प्रकार का दु:ख प्राप्त होने पर "श्रीकृष्ण: शरणं मम" इस महामंत्र का जप उच्चार करना चाहिये।

श्रीमन्महाप्रभु जी ने वेद गीता उपनिषद एवं सभी शास्त्रों का सार समन्वय करके तथा सभी प्रकार विचार करके दैवीजीवों के उद्धार के लिये भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र के शरणगमन पूर्वक आत्मनिवेदन करके उनकी सेवा स्मरण करते रहना यही निर्णय करके अपने अन्यायीजनों की सबसे प्रथम भगवान की शरणागति की द्रढता के लिये अष्टाक्षर मंत्र दीक्षा देकर उसका जप करने की आज्ञा दी है। इस आज्ञा का पालन करना अत्यावश्यक है। आप अष्टाक्षर मंत्र का जाप करें और अपने कुटुम्ब परिवार के साथ परिचय के वैष्णवौं को प्रेरणा देकर जपानुष्ठान में सम्मिलित होने के लिये प्रबन्ध करें.
॥श्रीकृष्ण: शरणं मम॥